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प्रधानमंत्री मोदी की विदेश यात्राएं: क्या भारत को मिल रहा है वास्तविक लाभ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया विदेश यात्राएं और ब्रिक्स सम्मेलन की तैयारियों पर एक गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। क्या ये यात्राएं भारत के लिए लाभकारी साबित होंगी? क्या भारत को अमेरिका और अन्य देशों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाने में सफलता मिलेगी? इस लेख में इन सवालों का उत्तर खोजा गया है।
 

प्रधानमंत्री की विदेश यात्राएं और ब्रिक्स सम्मेलन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राएं हाल ही में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। जंतर-मंतर पर देश में बिगड़ती स्थिति से ध्यान हटाने के लिए वे विदेश दौरे पर हैं। जुलाई के अंत से, मोदी या तो विदेश में हैं या दिल्ली में ऐसे कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं जो 2024 के आम चुनाव से पहले जी-20 सम्मेलन की तरह दिखते हैं। इस बार का यह कार्यक्रम भारत के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है। ब्रिक्स के अध्यक्ष के रूप में, दिल्ली में ब्रिक्स देशों के नेताओं का आगमन होगा। इसे सफल बनाने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मॉस्को का दौरा किया और राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की।


राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवाल ने सीमा विवाद पर प्रतिनिधि स्तर की वार्ता के लिए बीजिंग का दौरा किया, जहां उन्होंने विदेश मंत्री वांग यी के साथ चर्चा की। इस वार्ता के कई परिणामों पर चर्चा हुई। इसके बाद, प्रधानमंत्री मोदी उज्बेकिस्तान गए, जहां उन्होंने ताशकंद में द्विपक्षीय वार्ता की। इसके बाद, वे किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक पहुंचे, जहां उन्होंने शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में भाग लिया। वहां, उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी मुलाकात की।


इस प्रकार, 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीन, रूस और ईरान के नेताओं की उपस्थिति एक महत्वपूर्ण घटना होगी। इसके लिए विदेश मंत्री जयशंकर ने यूक्रेन का दौरा भी किया। हालांकि, इस सबके बावजूद, भारत को वास्तव में क्या लाभ होगा? ऐसा प्रतीत होता है कि भारत की कूटनीति वैश्विक स्तर पर प्रभावी है, लेकिन इसके परिणाम संदिग्ध हैं। अमेरिका, पश्चिमी यूरोप और भू-राजनीति में चीन, रूस और ईरान की उपस्थिति भारत की स्थिति को चुनौती दे सकती है।


विदेश मंत्री जयशंकर ने यूक्रेन में अमेरिका को यह संदेश दिया कि रूस से तेल खरीदने पर रोक लगाने से रूस-यूक्रेन युद्ध समाप्त नहीं होगा। इससे अमेरिका को यह संकेत मिला कि भारत रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा। जब अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो से प्रधानमंत्री मोदी और ईरान के राष्ट्रपति की मुलाकात के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि उन्हें नहीं लगता कि भारत ईरान के साथ कोई व्यापार संधि करेगा। उन्होंने भारत को चेतावनी दी कि यदि वह ईरान के साथ व्यापार करता है, तो अमेरिका प्रतिबंध लगाएगा।


हालांकि, प्रधानमंत्री मोदी ने पेजेशकियान के साथ द्विपक्षीय वार्ता की और कहा कि भारत और ईरान अपने व्यापार संबंधों को मजबूत करेंगे। यह ध्यान देने योग्य है कि भारत 2019 में ईरान पर प्रतिबंध से पहले उससे तेल खरीदता था और भुगतान रुपये में करता था। लेकिन अब, भारत ने ईरान से तेल खरीदना पूरी तरह से बंद कर दिया है।


यदि भारत स्वतंत्र कूटनीति का पालन कर रहा है, तो उसे अमेरिका के प्रतिबंधों से डरने के बजाय ईरान के साथ व्यापार बढ़ाना चाहिए। चीन इस मामले में लगातार आगे बढ़ रहा है। रूस से तेल खरीदने का मामला साहस का नहीं है, क्योंकि अमेरिका और यूरोप इसे सहन करते रहे हैं। नई स्थिति यह है कि रूस का तेल अब चीन द्वारा अधिक खरीदा जा रहा है। भारत अपनी आवश्यकताओं के लिए अमेरिका पर निर्भर होता जा रहा है।


चीन द्वारा आयोजित एससीओ की अगली मेज़बानी पाकिस्तान की होगी। क्या मोदी पाकिस्तान की लीडरशिप समिट में जाएंगे? इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के अस्थायी सदस्य के चुनाव में भारत की दावेदारी भी महत्वपूर्ण है। यदि भारत इस चुनाव में सफल होना चाहता है, तो उसे ताजिकिस्तान की दावेदारी को वापस लेना होगा।


इस सबके बीच, चीन की गतिविधियों को देखते हुए, क्या प्रधानमंत्री मोदी को ब्रिक्स और एससीओ की बैठकों के बीच चीन के वास्तविक इरादों पर चर्चा नहीं करनी चाहिए?