बंगाल चुनाव: ऐतिहासिक संदर्भ और वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य
बंगाल चुनाव का राजनीतिक परिदृश्य
स्वतंत्र भारत के इतिहास में ऐसा दृश्य पहले कभी नहीं देखा गया। एक राज्य, एक मुख्यमंत्री और केंद्र सरकार की सभी संस्थाएं, राष्ट्रीय मीडिया एक साथ मिलकर बंगाल के विधानसभा चुनाव को एक युद्ध की तरह प्रस्तुत कर रही हैं। प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने बंगाल पर ध्यान केंद्रित किया है, जबकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट मतदाताओं को प्रभावित करने में जुटे हैं। संसद भी इस मुद्दे पर सक्रिय है। राष्ट्रपति ने भी इस पर टिप्पणी की है कि बंगाल में क्या हो रहा है। इस सबके बीच, ममता बनर्जी और बंगाल की जनता को निशाना बनाया गया है। यह सब कुछ 2026 के विधानसभा चुनाव में ममता को हराने के लिए किया जा रहा है। मेरा मानना है कि परिणाम अच्छे नहीं होंगे। यह समय फिर से 1905 के बंग-भंग के दौर में लौटने जैसा है!
इतिहास की परछाई
मोहन भागवत जैसे हिंदू विचारकों ने भारत के विभाजन की जटिलताओं को नहीं समझा है। 1857 के विद्रोह के समय, जब मंगल पांडे ने बगावत की, तो मुसलमान भी उनके साथ खड़े थे। उस समय बंगाल की जनसंख्या लगभग आठ करोड़ थी, जबकि आज पश्चिम बंगाल में यह संख्या लगभग ग्यारह करोड़ है, जिसमें 70 प्रतिशत हिंदू और 30 प्रतिशत मुसलमान हैं।
1899 में लॉर्ड कर्जन के गवर्नर-जनरल बनने के बाद, उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के बीच विभाजन की नीति अपनाई। उनका मानना था कि यदि बंगाल पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो ब्रिटिश शासन लंबे समय तक नहीं टिक सकेगा। इसलिए, उन्होंने हिंदू-मुस्लिम विभाजन को बढ़ावा दिया।
वर्तमान राजनीतिक स्थिति
आज, मोदी सरकार और दिल्ली की सत्ता भी उसी मानसिकता में हैं। सभी संस्थाएं एक ही दिशा में काम कर रही हैं, यह मानते हुए कि केंद्र सरकार सही कर रही है। यदि मोदी सरकार की नीयत में खोट भी है, तो इसे सहन किया जा रहा है क्योंकि यह सत्ता का सवाल है। यह वही राजनीति है जो लॉर्ड कर्जन ने अपनाई थी।
क्या आज के नेता भी उसी तरह की सोच रखते हैं? क्या वे नहीं चाहते कि कोलकाता में उनका राज हो? यदि बंगाल जीत लिया गया, तो क्या यह सत्ता स्थायी नहीं होगी? मोदी और शाह ने क्या-क्या नहीं किया है, यह सोचने का विषय है।