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बंगाल में मतदाता सूची की जांच में हाई कोर्ट की चिंता

पश्चिम बंगाल में उच्च न्यायालय ने मतदाता सूची की जांच को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अदालत ने कहा है कि यदि ट्रिब्यूनल इसी गति से कार्य करते रहे, तो नामों की जांच में 21 वर्षों का समय लग सकता है। चुनाव आयोग का दावा है कि इस साल के अंत तक मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण पूरा हो जाएगा, लेकिन बंगाल में स्थिति अलग है। जानें इस मुद्दे की गहराई और क्या हो सकता है आगे।
 

हाई कोर्ट की गंभीर चेतावनी


यह चिंता किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल के उच्च न्यायालय की है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि ट्रिब्यूनल इसी गति से कार्य करते रहे, तो मतदाता सूची में से तार्किक विसंगतियों के आधार पर जिन व्यक्तियों के नाम हटाए गए हैं, उनका समाधान करने में 21 वर्षों का समय लग सकता है। चुनाव आयोग का दावा है कि इस वर्ष के अंत तक अधिकांश राज्यों में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पूरा हो जाएगा। वर्तमान में, तीसरे चरण में एक दर्जन से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की प्रक्रिया चल रही है। हालांकि, बंगाल में दूसरे चरण में एसआईआर की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जिसे पूरा करने में अब 21 साल और लगेंगे।


तार्किक विसंगतियों की जांच

बंगाल में चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति की एक श्रेणी बनाई है, जिसमें 27 लाख से अधिक लोगों के नाम शामिल किए गए हैं। इन नामों की जांच के लिए, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर रिटायर जजों की अध्यक्षता में 19 ट्रिब्यूनल गठित किए गए हैं। ये ट्रिब्यूनल अप्रैल से अब तक केवल 38 हजार नामों की जांच कर सके हैं। वर्तमान में, ट्रिब्यूनल के सामने 32 लाख नाम लंबित हैं। हर दिन जिन नामों का निपटारा किया जा रहा है, उन्हें देखते हुए हाई कोर्ट ने कहा है कि अभी 21 साल का समय लगेगा। दिलचस्प बात यह है कि जिन नामों की जांच की जा रही है, उनमें से लगभग 60 प्रतिशत को मतदाता सूची में शामिल करने की अनुमति मिल रही है। इसका मतलब है कि या तो उनकी सही तरीके से जांच नहीं की गई थी या पूर्वाग्रह के कारण उनके नाम हटाए गए थे। अब यह देखना होगा कि यदि अन्य राज्यों में भी तार्किक विसंगतियाँ पाई जाती हैं, तो क्या स्थिति बनती है।