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बंगाल सरकार ने धार्मिक मानदेय योजनाओं को किया समाप्त

बंगाल की नवनिर्वाचित सरकार ने धर्म के आधार पर मिलने वाले मानदेय को 1 जून से बंद करने का आदेश दिया है। मुख्यमंत्री शुभेदु अधिकारी की अगुवाई में हुई कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया कि सभी धार्मिक आधार पर चल रही वित्तीय सहायता योजनाएं समाप्त की जाएंगी। यह कदम तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ एक महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। जानें इस निर्णय के पीछे की वजहें और इसके संभावित राजनीतिक प्रभाव।
 

धर्म के आधार पर वित्तीय सहायता का अंत

बंगाल की नई सरकार, जिसका नेतृत्व शुभेदु अधिकारी कर रहे हैं, ने सत्ता में आते ही तुष्टिकरण की राजनीति पर जोरदार प्रहार किया है। उन्होंने आदेश दिया है कि धर्म के आधार पर मिलने वाले मानदेय को 1 जून से बंद किया जाएगा।


सोमवार को हुई कैबिनेट की बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि सरकार 'वोट बैंक' की पुरानी राजनीति को समाप्त करने के लिए तेजी से कदम उठा रही है।


बैठक में यह निर्णय लिया गया कि सभी धार्मिक आधार पर चल रही वित्तीय सहायता योजनाओं को पूरी तरह से समाप्त किया जाएगा। यह केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि बंगाल की राजनीतिक दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव है।


नई भाजपा सरकार का स्पष्ट संदेश है कि 'कल्याणकारी योजनाएं धार्मिक पहचान पर आधारित नहीं होनी चाहिए।'


पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा शुरू की गई इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों के लिए मासिक भत्ता योजना को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है।


यह ध्यान देने योग्य है कि तृणमूल कांग्रेस सरकार ने 2012 में पंजीकृत इमामों और मुअज्जिनों के लिए मासिक भत्ते की शुरुआत की थी।


जब मामला हाई कोर्ट में पहुंचा, तो इसे वक्फ बोर्ड के माध्यम से दिया जाने लगा। आलोचनाओं से बचने के लिए, 2020 में हिंदू पुजारियों के लिए भी भत्ता घोषित किया गया। इस साल मार्च में ममता सरकार ने मानदेय में 500 रुपये की वृद्धि की थी, जिसके बाद इमामों को 3,000 रुपये और मुअज्जिनों व पुजारियों को 2,000 रुपये मासिक दिए जा रहे थे, जिसे अब पूरी तरह से बंद कर दिया गया है।


इसके अलावा, बंगाल सरकार ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 2024 के फैसले के आधार पर मौजूदा ओबीसी सूची को रद्द और संशोधित करने का निर्णय लिया है। तृणमूल सरकार के दौरान शामिल किए गए 77 समुदायों (जिसमें 75 मुस्लिम समुदाय थे) को अदालत ने अमान्य कर दिया था।


धर्म के आधार पर वर्गीकरण करना एक धर्मनिरपेक्ष देश में असंवैधानिक है। धार्मिक मानदेय योजनाओं का अंत एक स्वागतयोग्य कदम है। देश में तुष्टिकरण की राजनीति का विरोध होना चाहिए और धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं समाप्त होनी चाहिए। यही देश की भलाई में है।



-इरविन खन्ना, मुख्य संपादक, दैनिक उत्तम हिन्दू।