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बिहार में राज्यसभा चुनाव: सत्तारूढ़ गठबंधन और विपक्ष के बीच टकराव

बिहार में राज्यसभा की एक सीट के लिए राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। एनडीए को पांचवीं सीट जीतने के लिए तीन वोटों की कमी का सामना करना पड़ रहा है, जबकि विपक्षी गठबंधन के पास 35 वोट हैं। इस चुनाव में कई प्रमुख दावेदार हैं, जिनमें राजद के रिटायर हो रहे सांसद भी शामिल हैं। जानें इस चुनाव की जटिलताएं और संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं।
 

राज्यसभा की सीटों पर घमासान

बिहार में राज्यसभा की एक सीट के लिए प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। राज्य में कुल पांच सीटें खाली हो रही हैं, जिनमें से भाजपा और जनता दल यू को दो-दो सीटें मिलने की संभावना है। हालांकि, सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए को पांचवीं सीट जीतने के लिए तीन वोटों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। यह स्थिति तब है जब सभी पार्टियां समान रूप से वोट बांटें। एक सीट जीतने के लिए 41 वोटों की आवश्यकता है। यदि चारों उम्मीदवारों को 41-41 वोट मिलते हैं, तो पांचवीं सीट के लिए 38 वोट शेष रहेंगे। लेकिन हर पार्टी एक या दो अतिरिक्त वोट आवंटित करेगी, जिससे पांचवें उम्मीदवार के लिए वोटों की कमी हो जाएगी।


विपक्षी गठबंधन के पास 35 वोट हैं। यदि इसमें असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के पांच और बसपा के एक विधायक का वोट जोड़ा जाए, तो संख्या 41 हो जाती है। उल्लेखनीय है कि राजद के दो प्रमुख उद्योगपति सांसद इस साल रिटायर हो रहे हैं। पिछले 30 वर्षों से बिहार और झारखंड से राज्यसभा में प्रतिनिधित्व कर रहे प्रेमचंद गुप्ता और अमरेंद्रधारी सिंह इस बार रिटायर होंगे। वहीं, उपेंद्र कुशवाहा और चिराग पासवान की पार्टी भी पांचवीं सीट के लिए दावा कर रही है। राजद की ओर से एक प्रभावशाली मुस्लिम उम्मीदवार को उतारने की चर्चा है, ताकि ओवैसी की पार्टी से वोटों का प्रबंधन किया जा सके। हालांकि, प्रेम गुप्ता के फिर से उम्मीदवार बनने की भी बातें चल रही हैं। यदि भाजपा ने पांचवीं सीट किसी सहयोगी पार्टी को दी और चुनाव को सही तरीके से प्रबंधित नहीं किया, तो परिणाम अलग हो सकता है। बिहार में गठबंधन पार्टियों के बीच अविश्वास को देखते हुए स्थिति स्पष्ट नहीं है। यदि राज्य में छठा उम्मीदवार आता है, तो घमासान निश्चित है।