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बीएमसी चुनाव में गवली परिवार को झटका, ठाकरे ब्रदर्स का वर्चस्व समाप्त

बीएमसी चुनाव के परिणामों ने बीजेपी और शिवसेना (शिंदे) के गठबंधन को मजबूती दी है, जिससे ठाकरे ब्रदर्स का राजनीतिक अस्तित्व संकट में आ गया है। गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली की बेटियों, गीता और योगिता गवली को भी हार का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव ने 28 वर्षों से चल रहे ठाकरे परिवार के वर्चस्व को समाप्त कर दिया है। जानें इस चुनाव के पीछे की पूरी कहानी और गवली परिवार की राजनीति पर इसका असर।
 

नई दिल्ली में बीएमसी चुनाव के परिणाम


नई दिल्ली: बीएमसी चुनाव के नतीजों ने बीजेपी और शिवसेना (शिंदे) के गठबंधन को मजबूत किया है, जिससे ठाकरे ब्रदर्स का राजनीतिक अस्तित्व संकट में आ गया है। इस चुनाव में गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली की बेटियों, गीता और योगिता गवली को भी हार का सामना करना पड़ा है।


ठाकरे ब्रदर्स की राजनीति पर असर

बीएमसी चुनाव के परिणामों ने ठाकरे परिवार की राजनीतिक स्थिति को कमजोर कर दिया है। राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे के साथ मिलकर चुनाव लड़ा, लेकिन मुंबई की जनता ने इस जोड़ी को नकारते हुए बीजेपी को जीत दिलाई। इस चुनाव ने 28 वर्षों से चल रहे ठाकरे परिवार के वर्चस्व को समाप्त कर दिया है, जिससे उद्धव ठाकरे के राजनीतिक भविष्य पर सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि एकनाथ शिंदे की शिवसेना अब असली शिवसेना मानी जा रही है।


गवली की बेटियों की हार

गवली की दोनों बेटियों को किसने हराया?


गीता गवली को भायखला के वार्ड 212 में समाजवादी पार्टी की अमरीन शहजान अब्राहानी ने हराया, जबकि वार्ड 207 में योगिता गवली बीजेपी के रोहिदास लोखंडे से हार गईं। इन हारों ने गवली परिवार के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर कर दिया है। दोनों बहनें अरुण गवली की पार्टी अखिल भारतीय सेना की ओर से चुनावी मैदान में उतरी थीं।


अरुण गवली का परिचय

कौन है अरुण गवली?


अरुण गवली एक पूर्व गैंगस्टर है जिसने 1970 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड में कदम रखा। वह और उसका भाई किशोर 'बायकुला कंपनी' नामक एक आपराधिक समूह का हिस्सा थे, जो सेंट्रल मुंबई के बायकुला, परेल और सात रास्ता क्षेत्रों में सक्रिय था। 1988 में, गवली ने गैंग की कमान संभाली और 80 के दशक के अंत और 90 के दशक में दाऊद इब्राहिम के गैंग के साथ संघर्ष में शामिल रहा।


राजनीति में एंट्री

ठाकरे के पॉलिटिकल सपोर्ट से राजनीति में हुई एंट्री


1980 के दशक में, गवली को शिवसेना के नेता बालासाहेब ठाकरे का समर्थन मिला। लेकिन 1990 के दशक में शिवसेना से मतभेद के बाद, उसने अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई और 2004 से 2009 तक चिंचपोकली सीट से विधायक रहा। 2008 में, उसे एक शिवसेना कॉर्पोरेटर के हत्या के आरोप में जेल भेजा गया था, और पिछले सितंबर में 17 साल जेल में बिताने के बाद उसे जमानत पर रिहा किया गया।