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ब्रिक्स सम्मेलन: भारत की भूमिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव

ब्रिक्स सम्मेलन ने भारत की वैश्विक भूमिका को एक नई दिशा दी है, लेकिन क्या यह वास्तव में कोई ठोस उपलब्धि है? जानें इस सम्मेलन में प्रस्तुत आंकड़ों का क्या महत्व है और भारत-चीन संबंधों का भविष्य क्या हो सकता है। क्या ब्रिक्स पश्चिमी वर्चस्व को चुनौती दे सकता है? इस लेख में हम इन सभी सवालों का विश्लेषण करेंगे।
 

ब्रिक्स की प्रासंगिकता पर विचार


ब्रिक्स के संदर्भ में विशेषज्ञों की राय विभाजित है। कुछ का मानना है कि इसका कोई महत्व नहीं है और भारत को इससे कोई लाभ नहीं होगा। इस श्रेणी में आर्थिक विश्लेषक सुरजीत भल्ला और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ राजेश राजगोपालन शामिल हैं। वहीं, दूसरी ओर कुछ विशेषज्ञ इसे पश्चिमी वर्चस्व के खिलाफ एक संतुलन बनाने वाला मंच मानते हैं। नई दिल्ली में आयोजित 18वें ब्रिक्स सम्मेलन को इस दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है, क्योंकि यह एक ऐसा बहुपक्षीय मंच है जहां सभी की आवाज सुनी जाती है।


हालांकि, वास्तविकता इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच है। ब्रिक्स न तो पूरी तरह से अप्रासंगिक है और न ही इतना महत्वपूर्ण है कि यह अमेरिका और यूरोप के नेतृत्व वाले वैश्विक ढांचे को चुनौती दे सके।


इसकी प्रासंगिकता को समझने के लिए, नई दिल्ली सम्मेलन में प्रस्तुत आंकड़ों पर ध्यान देना आवश्यक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई बार इन आंकड़ों का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि ब्रिक्स दुनिया की 50% जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करता है। यह तथ्य निर्विवाद है, क्योंकि भारत और चीन की जनसंख्या मिलाकर तीन अरब है।


हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि ब्रिक्स देशों की जीडीपी 40% है, जबकि जी7 देशों की जीडीपी 29% है। यह आंकड़ा परचेज पावर पैरिटी (PPP) पर आधारित है। जब हम नॉमिनल जीडीपी की बात करते हैं, तो जी7 की जीडीपी 44% है, जबकि ब्रिक्स की 29% है।


ब्रिक्स में चीन की अर्थव्यवस्था का योगदान इतना बड़ा है कि यदि इसे हटा दिया जाए, तो ब्रिक्स का महत्व काफी कम हो जाएगा। उदाहरण के लिए, यदि ब्रिक्स की नॉमिनल जीडीपी 30 से 35 ट्रिलियन डॉलर है, तो अकेले चीन की जीडीपी लगभग 21 ट्रिलियन डॉलर है।


ब्रिक्स देशों ने हाल ही में डॉलर के वर्चस्व को समाप्त करने के लिए एक नई मुद्रा लाने की बात की थी, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति की चेतावनी के बाद यह प्रयास ठंडे बस्ते में चला गया। अब स्थानीय मुद्राओं में व्यापार की बात हो रही है।


ब्रिक्स एक ऐसा मंच है जहां व्यापार और सामरिक चर्चाएं संभव हैं, लेकिन सभी देशों को चीन की विस्तारवादी नीतियों से सतर्क रहना होगा।


हालांकि, नई दिल्ली में ब्रिक्स का आयोजन सफल रहा है, लेकिन क्या वास्तव में कोई ठोस उपलब्धि हुई है? 'नई दिल्ली घोषणा' में कहा गया है कि चीन और रूस भारत का समर्थन करेंगे, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह समर्थन कितना प्रभावी होगा।


भारत और चीन के संबंधों का भविष्य भी ब्रिक्स के भविष्य पर निर्भर करता है। यदि चीन पाकिस्तान के प्रति अपने रुख को नहीं बदलता है और सीमा विवादों को सुलझाने में सहयोग नहीं करता है, तो भारत का विश्वास बहाल करना मुश्किल होगा।