भाजपा और विपक्षी दलों के बीच चुनावी मुकाबला: एक समीक्षात्मक दृष्टिकोण
चुनाव परिणामों का विश्लेषण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के नेता भले ही यह दिखाने की कोशिश कर रहे हों कि चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों में से भाजपा और उसके सहयोगियों ने शानदार प्रदर्शन किया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि विपक्षी दलों ने चुनाव में लगभग बराबरी हासिल की है। भाजपा और उसके सहयोगियों ने 15 सीटें जीतीं, जबकि विपक्षी दलों और निर्दलियों ने 13 सीटें अपने नाम की। पहले यह अनुमान था कि एनडीए 16 सीटें जीतने में सफल होगा, लेकिन अंततः बिहार की दरभंगा स्नातक सीट पर भाजपा के सर्वेश कुमार को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें राजद के अनिल झा ने हराया। यह दिलचस्प है कि सर्वेश कुमार ने पिछली बार निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार भाजपा के साथ मिलकर हार गए। इस बार बिहार में भाजपा को दो सीटें मिली हैं, जबकि राजद ने भी दो सीटें जीती हैं, जबकि पिछली बार उसे एक भी सीट नहीं मिली थी।
बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में भी वाराणसी स्नातक सीट पर समाजवादी पार्टी ने दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती में जीत हासिल की। इससे पहले, वाराणसी शिक्षक सीट पर भी सपा ने जीत दर्ज की थी। गोरखपुर की सीट पर भाजपा ने मुश्किल से 307 वोटों से जीत हासिल की, जहां निर्दलीय राजीव यादव ने कड़ी टक्कर दी। सपा के संजयन त्रिपाठी उस सीट पर तीसरे स्थान पर रहे, जो यह दर्शाता है कि सपा का वोट अगड़ी जाति के उम्मीदवार को नहीं मिल रहा है। भाजपा के लिए यह चिंता का विषय है कि वाराणसी में उसके ब्राह्मण उम्मीदवार डॉक्टर प्रमोद मिश्रा और राजपूत उम्मीदवार केदारनाथ सिंह दोनों ही हार गए। लखनऊ में कुर्मी उम्मीदवार अवनीश सिंह पटेल भी हार गए। यूपी में भाजपा का वोट समीकरण बिगड़ गया है। हालांकि, उसने 11 में से 6 सीटें जीतीं, लेकिन कुल पड़े वोट में सपा ने भाजपा से अधिक वोट प्राप्त किए।
महाराष्ट्र में भी भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा, जहां उसने पुणे की दोनों सीटें और नागपुर की सीट खो दी। वहां विपक्ष के महाविकास अघाड़ी ने तीन सीटें जीतीं, जबकि भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति ने केवल दो सीटें हासिल कीं। इन तीन राज्यों में एनडीए को 11 सीटें मिलीं, जबकि विपक्ष ने 13 सीटें जीतीं। बिहार और महाराष्ट्र में भाजपा विरोधी दलों ने उससे अधिक सीटें जीती हैं। कर्नाटक के चुनावों के परिणामों ने समीकरण को बदल दिया है, जहां कांग्रेस एक भी सीट नहीं जीत सकी। भाजपा ने अपनी तीन सीटें बचा लीं, जबकि उसकी सहयोगी जेडीएस ने एक सीट कांग्रेस से छीन ली। यदि कांग्रेस एक सीट बचा लेती, तो विपक्ष की सीटों की संख्या 14 हो जाती। इस प्रकार, भले ही एनडीए की जीत का ढोल पीटा जा रहा हो, लेकिन वास्तविकता यह है कि भाजपा और एनडीए का प्रदर्शन केवल कर्नाटक में ही अच्छा रहा है। अन्य तीन राज्यों में उसे कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है।