भाजपा का एसआईआर अभियान: घुसपैठियों की पहचान या राजनीतिक खेल?
भाजपा का नया एजेंडा
भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता, जिनमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन शामिल हैं, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को घुसपैठियों को देश से बाहर निकालने के उद्देश्य से स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने राहुल गांधी के एसआईआर विरोध प्रदर्शन को घुसपैठियों की रक्षा के रूप में आरोपित किया है। उनका मानना है कि जैसे ही घुसपैठियों का जिक्र होगा, मामला हिंदू और मुस्लिम के बीच विभाजित हो जाएगा, जिससे हिंदू मतदाता राहुल के खिलाफ सक्रिय हो जाएंगे। यह ध्यान देने योग्य है कि घुसपैठियों का मुद्दा भाजपा का पुराना चुनावी नारा रहा है।
बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे सीमावर्ती राज्यों से लेकर दिल्ली, हरियाणा और महाराष्ट्र तक, भाजपा ने हमेशा घुसपैठियों के मुद्दे पर वोट मांगे हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी यह मुद्दा प्रमुख रहा। लेकिन क्या भाजपा एसआईआर को घुसपैठियों से जोड़कर राहुल गांधी और विपक्ष के आंदोलन को कमजोर कर पाएगी?
यह चुनौतीपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया को घुसपैठियों की पहचान करने वाले अभियान के रूप में स्थापित करना कठिन होगा। यदि एसआईआर का उद्देश्य घुसपैठियों की पहचान करना है, तो सरकार और चुनाव आयोग यह क्यों नहीं बता रहे हैं कि अब तक 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कितने घुसपैठियों की पहचान की गई है, कितने पकड़े गए हैं और कितनों को बाहर निकाला गया है?
पिछले साल जून में जब बिहार में एसआईआर का अभियान शुरू हुआ, तब इससे जुड़े कई मामले सुप्रीम कोर्ट में पहुंचे थे। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया था कि नागरिकता तय करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास नहीं है। इसी तरह, घुसपैठियों की पहचान करना और उन्हें बाहर निकालना न तो चुनाव आयोग के अधिकार में है और न ही इसके लिए आवश्यक साधन उसके पास हैं।
इसलिए यह सवाल उठता है कि यदि चुनाव आयोग को किसी मतदाता की नागरिकता पर संदेह होता है, तो वह क्या करेगा? अदालत ने कहा था कि ऐसे मामलों को केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास भेजा जाएगा। क्या चुनाव आयोग बता सकता है कि उसने 13 करोड़ से अधिक नामों में से कितनों की नागरिकता पर संदेह किया और कितने मामलों को गृह मंत्रालय को भेजा?
सोशल मीडिया पर कुछ लोग अनुमान लगा रहे हैं कि 13 करोड़ में से लगभग तीन करोड़ लोग सत्यापन के दौरान अपने पते पर नहीं मिले। 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 2.80 करोड़ लोगों का नाम मृत श्रेणी में काटा गया है। इसके अलावा, 6.30 करोड़ लोगों के लिए कहा गया है कि वे स्थायी रूप से स्थानांतरित हो गए हैं।
यदि इन अनुमानों को मान लिया जाए, तो क्या यह संभव है कि देश में तीन करोड़ लोग घुसपैठिए हैं? यदि ऐसा है, तो 12 साल से सत्ता में रहे नरेंद्र मोदी और सात साल से गृह मंत्रालय संभाल रहे अमित शाह क्या उत्तर देंगे? क्या वे बताएंगे कि इतने घुसपैठिए कहां से आए? यदि पहले से थे, तो उन्हें निकालने के लिए क्या कदम उठाए गए?
वास्तव में, यह मामला घुसपैठियों का नहीं है। सरकार को यह पता है और भाजपा के लोग पहले यह दावा नहीं करते थे कि एसआईआर घुसपैठियों की पहचान के लिए है। पहले कहा जाता था कि यह मतदाता सूची की शुद्धता के लिए किया जा रहा है। अब जब राहुल गांधी और विपक्ष ने एसआईआर के खिलाफ आंदोलन तेज किया है, तब भाजपा ने घुसपैठियों की पहचान का दावा करना शुरू कर दिया है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन एसआईआर का जो उद्देश्य बता रहे हैं, वही सरकार सुप्रीम कोर्ट में बताती है या नहीं।