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भाजपा का नैरेटिव कंट्रोल: नई पीढ़ी की चुनौतियाँ और समाधान

भाजपा का नैरेटिव कंट्रोल अब कमजोर हो चुका है, जो कि प्रचार तंत्र की कमज़ोरी के कारण नहीं, बल्कि प्रचार और वास्तविकता के बीच के अंतर के कारण है। नई पीढ़ी के बीच जुमलों को बेचना पहले की तरह आसान नहीं रह गया है। जानें कि पार्टी के नेतृत्व ने इस स्थिति को कैसे समझा और क्या कदम उठाए जा रहे हैं। क्या ये कदम प्रभावी होंगे? जानने के लिए पूरा लेख पढ़ें।
 

भाजपा का नैरेटिव कंट्रोल


भाजपा का नैरेटिव कंट्रोल अब कमजोर हो चुका है, जो कि प्रचार तंत्र की कमज़ोरी के कारण नहीं, बल्कि प्रचार और वास्तविकता के बीच के अंतर के कारण है। आज की युवा पीढ़ी के बीच जुमलों को बेचना पहले की तरह आसान नहीं रह गया है।


यह सकारात्मक है कि भाजपा के नेतृत्व ने अपने सियासी नैरेटिव के कमजोर होने का एहसास किया है। हालांकि, जो कारण उन्होंने पहचाने हैं और जो समाधान सुझाए हैं, वे सतही प्रतीत होते हैं। पार्टी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय को हटाने का निर्णय शायद इसी समझ के कारण लिया गया है कि वे नई पीढ़ी के लिए प्रभावी प्रचार सामग्री नहीं तैयार कर सके। इसका परिणाम जेन-ज़ी के विद्रोही तेवर के रूप में सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस स्थिति को समझा और इसी कारण वे इंस्टाग्राम पर सक्रिय हुए।


भाजपा के लिए यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि जेन-ज़ी का एक बड़ा हिस्सा हिंदू-मुस्लिम द्वेष की कहानियों से बाहर निकलने लगा है। इसके साथ ही, स्कूलों में छात्रों के विरोध प्रदर्शनों से भी पार्टी को चिंता हो रही होगी। दीपक म्हास्के को अब आईटी सेल का कार्यभार सौंपा गया है, ताकि वे जेन-ज़ी और जेन-अल्फा का मन जीत सकें। लेकिन यह एक ऐसी चुनौती है, जो पार्टी के प्रचार तंत्र की सीमाओं से परे है।


भाजपा का नैरेटिव कंट्रोल इसलिए कमजोर पड़ा है क्योंकि प्रचार और वास्तविकता की दिशाएं भिन्न हो गई हैं। पहले की पीढ़ी को सामाजिक दुराव और राजनीतिक जुमलों से भरमाना आसान था, लेकिन अब अवसरहीनता से ग्रस्त पीढ़ी के बीच ऐसी कहानियों को बेचना कठिन हो गया है। खासकर जब ये युवा सोशल मीडिया के माध्यम से गिरते इन्फ्रास्ट्रक्चर और अन्य समस्याओं से अवगत हैं। इसलिए, बेहतर होता कि भाजपा केवल नए आईटी प्रमुख को लाने के बजाय सरकारी नीतियों में सुधार, नीतिगत कार्यान्वयन को दुरुस्त करने और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाती। बिना ठोस सामग्री के प्रचार कभी सफल नहीं हो सकता।