भाजपा के यूसीसी वादे पर उठते सवाल: क्या है सरकार की रणनीति?
भाजपा के चुनावी वादे और यूसीसी
भारतीय जनता पार्टी ने 6 अप्रैल 1980 को अपने गठन के बाद से कई चुनावों में तीन प्रमुख वादे किए हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 का हटाना, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण, और समान नागरिक संहिता (यूसीसी) शामिल हैं। भाजपा ने पहले दो वादों को सफलतापूर्वक पूरा किया है। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 और 35 को समाप्त किया गया, और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया। इसके बाद, अगस्त 2020 में राम जन्मभूमि मंदिर का शिलान्यास हुआ और जनवरी 2024 में इसका उद्घाटन किया गया। हालांकि, यूसीसी को लागू करने के लिए भाजपा की केंद्र सरकार ने सीधा रास्ता अपनाने के बजाय जटिल रास्ता चुना है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सरकार को चुनौती दी है कि वह संसद में कानून बनाकर पूरे देश में एक समान कानून लागू करे। पहले भी ऐसा ही वादा किया गया था कि पूरे देश में एक समान नागरिक कानून होना चाहिए। लेकिन केंद्र सरकार ने राज्यों के माध्यम से यूसीसी लागू करने का निर्णय लिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने यह घोषणा की है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और एनडीए के शासन वाले 21 राज्यों में यूसीसी लागू किया जाएगा।
हालांकि, यह सवाल उठता है कि अगले दो वर्षों में 14 राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, और यदि भाजपा कुछ राज्यों में हार जाती है तो क्या होगा? जानकार सूत्रों का कहना है कि सरकार का इरादा केंद्रीय कानून बनाने का था, लेकिन 2024 के चुनाव परिणामों ने स्थिति को बदल दिया। बताया जा रहा है कि उत्तराखंड में जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई की अध्यक्षता में एक समिति बनाई गई थी, जिसका उद्देश्य प्रायोगिक रूप से यूसीसी लागू करना था।
सरकार ने पहले ही राज्यों को निर्देश दिया था कि वे समान नागरिक कानून का मसौदा तैयार करें। उत्तराखंड का कानून एक टेम्पलेट के रूप में कार्य कर रहा है, जिसमें विभिन्न राज्यों में थोड़े बदलाव के साथ लागू किया जा रहा है। गुजरात, मध्य प्रदेश और असम ने विधानसभा से विधेयक पास कर लिया है, जबकि गोवा में भाजपा ने इस बिल पर रोक लगा दी है।