भारत-ईरान संबंधों में चाबहार पोर्ट का महत्व और बजट की कमी
चाबहार पोर्ट पर भारत और ईरान के बीच बढ़ती चर्चा
भारत और ईरान के बीच संबंध हमेशा से रणनीतिक सहयोग पर आधारित रहे हैं, लेकिन हाल ही में चाबहार पोर्ट से जुड़ी खबरों ने इन चर्चाओं को और तेज कर दिया है। ईरान के उप विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने इस साल भारत द्वारा चाबहार परियोजना के लिए बजट आवंटन न करने को निराशाजनक बताया है।
उन्होंने कहा कि यह निर्णय केवल ईरान के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के लिए भी निराशा का कारण है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पहले चाबहार को 'स्वर्णिम द्वार' के रूप में वर्णित किया था, जो हिंद महासागर क्षेत्र को मध्य एशिया, काकेशस और यूरोप से जोड़ने की क्षमता रखता है।
चाबहार पोर्ट, जो ईरान के दक्षिण-पूर्वी सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है, भारत के सहयोग से विकसित किया जा रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए सीधा व्यापार मार्ग उपलब्ध कराना है, जिससे पाकिस्तान को बायपास किया जा सके।
सूत्रों के अनुसार, 2024 में समझौते के बाद यह पहला मौका है जब भारत के केंद्रीय बजट में इस परियोजना के लिए कोई राशि आवंटित नहीं की गई है। पहले हर साल लगभग 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जाता था।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का भी इस परियोजना पर प्रभाव पड़ रहा है। पिछले वर्ष अमेरिका ने ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन भारत को चाबहार में अपनी भागीदारी जारी रखने के लिए छह महीने की छूट दी गई थी, जो 26 अप्रैल को समाप्त होने वाली है।
ईरान के विदेश मंत्री ने कहा कि यदि इस बंदरगाह का पूर्ण विकास होता है, तो यह भारत के लिए मध्य एशिया और यूरोप तक पहुंचने का सबसे प्रभावी ट्रांजिट मार्ग बन सकता है। उनके अनुसार, यह परियोजना क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को नई दिशा दे सकती है।
इस बीच, भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने हाल ही में पुष्टि की थी कि चाबहार से जुड़े मुद्दों पर अमेरिका के साथ सक्रिय संवाद जारी है।
कुल मिलाकर, चाबहार पोर्ट केवल एक बुनियादी ढांचा परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की क्षेत्रीय रणनीति और भू-राजनीतिक संतुलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिस पर आने वाले महीनों में होने वाले कूटनीतिक फैसलों की नजर टिकी हुई है।