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भारत का तेल आयात बिल 61% बढ़ा, अमेरिका-ईरान संघर्ष का असर

भारत के कच्चे तेल के आयात पर खर्च में 61% की वृद्धि हुई है, जो अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष का परिणाम है। इस लेख में जानें कि कैसे इन घटनाओं ने भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है, और भविष्य में तेल की कीमतों में क्या बदलाव आ सकते हैं।
 

तेल बिल में वृद्धि

मध्यपूर्व में चल रहे संघर्ष के कारण भारत के तेल आयात पर खर्च में भारी वृद्धि हुई है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कच्चे तेल के आयात पर खर्च पिछले वर्ष की इसी अवधि की तुलना में 61% बढ़कर 49.8 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। हालांकि, पेट्रोल के आयात की मात्रा में कमी आई है, जैसा कि पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) ने बताया।


कीमतों में वृद्धि का कारण

अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष और होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हुई है, जिससे भारत का तेल आयात बिल बढ़ा है। जून तिमाही में भारत ने 5.98 करोड़ टन कच्चा तेल आयात किया, जो पिछले वर्ष की इसी अवधि में 6.26 करोड़ टन था।


जून में आयात में कमी

PPAC के आंकड़ों के अनुसार, जून में कच्चे तेल का आयात 7% घटकर 1.89 करोड़ टन रह गया, जबकि पिछले वर्ष की इसी अवधि में यह 2.03 करोड़ टन था। इस दौरान आयात बिल 48% बढ़कर 14.7 अरब डॉलर हो गया। भारत कच्चे तेल का सबसे बड़ा आयातक देश है, जो अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है।


अप्रैल में कीमतों में उतार-चढ़ाव

अप्रैल में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। अमेरिका-ईरान के बीच अस्थायी युद्ध विराम की घोषणा के बाद 17 अप्रैल को कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गई। हालांकि, संघर्ष फिर से शुरू होने की आशंका के चलते 30 अप्रैल को कीमत बढ़कर 126.41 डॉलर प्रति बैरल हो गई। इस महीने में तेल की औसत कीमत लगभग 117 डॉलर प्रति बैरल रही।


भविष्य में कीमतों में वृद्धि की संभावना

मई के पहले सप्ताह में कच्चे तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से अधिक रही, जबकि महीने के अंत में शांति की उम्मीदों के बीच यह गिरकर 92.05 डॉलर प्रति बैरल पर आ गई। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों की आवाजाही पर खतरा मंडरा रहा है, जिससे तेल की कीमतें फिर से बढ़ सकती हैं।