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भारत का पेट्रोल रुपया: क्या यह डॉलर की मोनोपोली को चुनौती देगा?

भारत ने तेल की खरीद में डॉलर की जगह रुपये का उपयोग करने की नई अवधारणा 'पेट्रोल रुपया' पेश की है। यह कदम वैश्विक तेल व्यापार में डॉलर के दबदबे को चुनौती देने का प्रयास है। आरबीआई की नई नीति के तहत, विदेशी धारक अब भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश कर सकते हैं, जिससे रुपये का उपयोग बढ़ेगा। जानें इस नई व्यवस्था के पीछे की रणनीति और इसके संभावित प्रभावों के बारे में।
 

भारत का नया आर्थिक मॉडल

तेल के व्यापार में हमेशा डॉलर का दबदबा रहा है, लेकिन भारत ने अब यह स्पष्ट कर दिया है कि वह इस पर निर्भर नहीं रहेगा। भारत ने 'पेट्रोल रुपया' की अवधारणा पेश की है, जो यह दर्शाता है कि अब तेल की खरीद में डॉलर की जगह भारतीय रुपया इस्तेमाल होगा। यह एक नई व्यवस्था है, जिसमें भारत क्रूड ऑयल के लिए भुगतान रुपये में करेगा।


यह कदम पेट्रो डॉलर प्रणाली को चुनौती देने का प्रयास है, जहां अधिकांश तेल का व्यापार डॉलर में होता है। चाहे वह रूस हो, अमेरिका या ब्राजील, भारत अब रुपये में भुगतान करने की योजना बना रहा है। इसके साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की स्मार्ट रिसाइक्लिंग रणनीति भी है, जो रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेजकर वापस लाने का काम करती है।


पिछले 50 वर्षों से, वैश्विक तेल व्यापार डॉलर में होता आया है, जिसे पेट्रो डॉलर प्रणाली कहा जाता है। अमेरिका ने सऊदी अरब और कुवैत जैसे देशों के साथ समझौता किया था कि वे तेल बेचेंगे, लेकिन भुगतान डॉलर में होगा। अब भारत जैसे देश यह सवाल उठा रहे हैं कि क्या उनका रुपया कमतर है।


2025 में, आरबीआई ने एक महत्वपूर्ण सर्कुलर जारी किया, जिसमें विदेशी धारकों को भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों और ट्रेजरी बिल्स में निवेश करने की अनुमति दी गई। इसका मतलब यह है कि रूस जैसे देश, जो भारत को तेल बेचते हैं, अब रुपये में भुगतान स्वीकार करेंगे और फिर उन रुपयों को भारत में ही निवेश करेंगे।