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भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय मांग और नए रक्षा समझौते

भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय मांग में तेजी आई है, खासकर ऑपरेशन सिंदूर के बाद। हाल ही में चार मुस्लिम देशों ने दोहा में एक रक्षा सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिससे भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की संभावित विदेशी बिक्री पर सवाल उठ रहे हैं। भारत और इंडोनेशिया के बीच हुए रक्षा समझौतों की सुरक्षा प्रावधानों पर चर्चा की गई है, जबकि विशेषज्ञों ने इन समझौतों के प्रभाव को लेकर आशंकाओं को खारिज किया है। जानिए इस नए विकास का भारत की रक्षा नीति पर क्या असर हो सकता है।
 

भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की बढ़ती मांग

ऑपरेशन सिंदूर के बाद, भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह मिसाइल, जो पाकिस्तान के कई एयरबेस को नष्ट करने की क्षमता रखती है, अब मुस्लिम देशों द्वारा भी खरीदी जा रही है। हाल ही में, चार मुस्लिम देशों - पाकिस्तान, तुर्की, क़तर और इंडोनेशिया ने दोहा में रक्षा सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते ने यह सवाल उठाया है कि क्या इसका प्रभाव भारत की ब्रह्मोस मिसाइल की संभावित विदेशी बिक्री पर पड़ेगा। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य चारों देशों के बीच सैन्य उत्पादन, रक्षा क्षमताओं और तकनीकी प्रशिक्षण में सहयोग को बढ़ाना है।


भारत-इंडोनेशिया रक्षा समझौते पर सवाल

भारत ने जुलाई में इंडोनेशिया के साथ लगभग 63 करोड़ डॉलर के दो महत्वपूर्ण रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल और अस्त्र एयर टू एयर मिसाइल की बिक्री शामिल है। नए रक्षा समझौतों के बाद, यह चिंता जताई जा रही है कि क्या इंडोनेशिया की पाकिस्तान और तुर्की के साथ बढ़ती रक्षा साझेदारी भारत के साथ हुए इन करारों को प्रभावित कर सकती है।


डीआरडीओ के चेयरमैन का बयान

डीआरडीओ के चेयरमैन और ब्रह्मोस एयररोस्पेस के पूर्व सीईओ सुधीर कुमार मिश्रा ने एक मीडिया चैनल से बातचीत में कहा कि भारत-इंडोनेशिया रक्षा समझौतों में सुरक्षा के पर्याप्त प्रावधान शामिल हैं। उन्होंने बताया कि इंडोनेशिया को केवल उपयोग से संबंधित मैनुअल प्रदान किया जाएगा, जबकि तकनीकी ट्रांसफर से संबंधित जानकारी नहीं दी जाएगी। इसके अलावा, समझौते में डेटा सुरक्षा, बौद्धिक संपदा और रक्षा संप्रभुता से जुड़े सख्त प्रावधान भी शामिल हैं।


विशेषज्ञों की राय

रिपोर्ट के अनुसार, रिटायर्ड ग्रुप कैप्टन अजय अहरावत ने भारत-इंडोनेशिया रक्षा समझौतों के प्रभावित होने की आशंकाओं को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि किसी समझौता ज्ञापन को सैन्य गठबंधन के समान नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार, ऐसे एमओयू के लिए पहले से तय रक्षा निर्यात करार को छोड़ना समझदारी नहीं होगी।


भद्र एमओयू का महत्व

अहरावत ने भद्र एमओयू को काम के बंटवारे से संबंधित व्यवस्था बताया है। यह समान इस्लामी पहचान वाले देशों के बीच रक्षा अनुसंधान एवं विकास में तालमेल बढ़ाने की एक पहल है। उन्होंने कहा कि भारत को इस समझौते पर ध्यान रखना चाहिए, लेकिन इससे घबराने की आवश्यकता नहीं है। 21 अक्टूबर को कतर की राजधानी दोहा में चारों देशों ने इस बहुपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसका उद्देश्य रक्षा उद्योग, सैन्य उत्पादन, तकनीकी प्रशिक्षण और अनुसंधान एवं विकास में सहयोग बढ़ाना है।