भारत की राजनीति में ढीठता का नया अध्याय
सियासत की नई परिभाषा
वर्तमान समय के राजनीतिक नेता निर्भीकता और लज्जाहीनता के नए मानक स्थापित कर रहे हैं। उन्हें शाश्वत ढीठता का पाठ पढ़ाया गया है। उनके मार्गदर्शक कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि वे ऐसे लोग हैं जो मर्यादाओं को तोड़ते हुए अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं।
भारत की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में ढीठता का जो स्तर बढ़ा है, वह पहले कभी नहीं देखा गया। यह स्थिति हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ती है। पहले, सामंतशाही में भी कुछ हद तक लोकलाज का पालन होता था।
महाजनपद काल में शासन के निर्णय जनसभाओं पर आधारित होते थे। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में भारत में 16 महाजनपद थे, जिनमें से अधिकांश गणराज्य थे। लेकिन आजकल, सत्ता में बैठे लोग अपने स्वार्थ के लिए जनता की आवाज को दबा रहे हैं।
पिछले एक दशक में, समाज में निरंतर आर्तनाद सुनाई दे रहा है। हर मुद्दे पर रोने की आदत बन गई है। नोटबंदी, कोरोना संकट, धारा 370 का हटना, और चुनावी प्रक्रियाओं में बदलाव जैसे मुद्दों पर निरंतर विलाप हो रहा है।
इस प्रकार की निराशा के बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक ऐसे देश का नेतृत्व करना है जो हर बात पर रोता है। भले ही उन्होंने पंडित नेहरू से अधिक समय तक शासन किया हो, लेकिन ऐसे रोते हुए देश को विश्वगुरु बनाना आसान नहीं है।
यह अजीब है कि लोग चाहते हैं कि अगर किसी मंत्री पर आरोप लगे तो उसे तुरंत इस्तीफा देना चाहिए, लेकिन जब बात सत्ता की आती है, तो सब कुछ धैर्यपूर्वक चलाया जाता है। यह नया भारत है, जो नियमों और कानूनों के अनुसार चलता है।
इस दौर के नेता निर्भीकता और लज्जाहीनता की भट्टी से तप कर निकले हैं। वे अपने कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं, और उनकी गुरु-दक्षिणा के गर्व से उनके गुरुजन की छाती फूल रही है। इसलिए, आप जितना रोएंगे, सत्ता में बैठे लोग उतना ही हंसेंगे।