भारत की राजनीति में बदलाव: मोदी और शाह का विपक्ष में न होना
भारत की राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण
पिछले 12 वर्षों में भारत की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आया है। अब सत्तारूढ़ दल और सरकार के बीच का अंतर मिट गया है। विपक्ष को अब प्रतिद्वंद्वी के बजाय दुश्मन के रूप में देखा जा रहा है। समय के साथ, विपक्ष के लिए चुनाव लड़ना कठिन होता जा रहा है, और एंटी इन्कम्बैंसी के बजाय प्रो इन्कम्बैंसी की अवधारणा पर विचार किया जा रहा है। यह स्पष्ट है कि यह कोई सकारात्मक स्थिति नहीं है।
सत्तारूढ़ दल की हार अब कठिन होती जा रही है क्योंकि चुनाव जीतने के लिए सत्ता के दुरुपयोग में कोई संकोच नहीं रह गया है। सरकारें बिना अर्थव्यवस्था की चिंता किए मुफ्त चीजें बांटती हैं और सत्ता के संसाधनों का खुला उपयोग करती हैं। विपक्ष की संभावनाओं को कमजोर करने के लिए एजेंसियों का इस्तेमाल किया जाता है। चुनावी रणनीति के तहत सांप्रदायिक और जातीय विभाजन को बढ़ावा दिया जाता है। यही प्रो इन्कम्बैंसी की परिभाषा है।
भारत का विपक्ष इन चुनौतियों का सामना कर रहा है, और यह दिलचस्प है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह ने कभी भी विपक्ष में रहकर चुनाव नहीं लड़ा। नरेंद्र मोदी पहले मुख्यमंत्री बने और विधानसभा चुनाव बाद में लड़ा। उनका पहला विधानसभा चुनाव 2002 में हुआ, जब गुजरात में दंगे हो चुके थे।
2014 के लोकसभा चुनाव में, नरेंद्र मोदी लगभग 13 वर्षों से गुजरात के मुख्यमंत्री थे और भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार थे। उस समय उनके पास सभी संसाधन थे। हालांकि, यह कहना गलत नहीं होगा कि उन्होंने चुनाव में मेहनत की।
यहां यह ध्यान देने योग्य है कि मोदी और शाह ने कभी भी विपक्ष में रहकर चुनाव नहीं लड़ा। यदि उन्हें कभी विपक्ष में रहकर चुनाव लड़ना पड़ा, तो क्या होगा? क्या वे उन स्थितियों का सामना कर पाएंगे, जिनका सामना आज के विपक्षी नेता कर रहे हैं?
ये सभी सवाल काल्पनिक हैं, लेकिन विचार करने योग्य हैं। क्या मोदी और शाह की रणनीति तब भी सफल होगी जब वे विपक्ष में होंगे? यह एक दिलचस्प विषय है, क्योंकि आज की कटुता और कड़वाहट के बीज क्या पहले से ही बोए गए थे?