भारत की राजनीतिक यात्रा: 2014 से आज तक की उम्मीदें और वास्तविकता
2014 की उम्मीदें और आज का भारत
क्या आप 14 मई 2014 से पहले के समय को याद कर सकते हैं? उस समय लोगों में एक नई उम्मीद थी, जैसे कि 'अच्छे दिनों' की आहट सुनाई दे रही थी। हर हिंदू इस अवसर को महसूस कर रहा था, मानो कलियुग का अंत हो रहा हो और सतयुग का आगमन हो रहा हो। काला धन और काली अर्थव्यवस्था समाप्त होने की बातें हो रही थीं। भारत को आत्मनिर्भर और शक्तिशाली बनाना था। तब स्वच्छता और स्मार्ट शहरों का सपना भी देखा जा रहा था।
मैं भी उस समय ऐसे ही अवसर की उम्मीदों में था।
हालांकि, मैं उन कुछ लोगों में से हूं जिन्होंने कई बार भारत के अवसर को अपने सामने आते देखा है। 1977 में दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में मैं भी मौजूद था, जब सुरेंद्र मोहन और लालकृष्ण आडवाणी ने अपनी बातें साझा की थीं। उस दिन जब चुनाव परिणाम आए, तो भीड़ में एक नई क्रांति का अहसास हुआ।
दिल्ली में पहली बार एक गैर-कांग्रेस सरकार बनी थी। उस समय जो उम्मीदें थीं, वे अभूतपूर्व थीं। लेकिन मोरारजी सरकार के कार्यकाल में क्या हुआ? लोगों ने खुद को ठगा हुआ महसूस किया। इंदिरा गांधी ने फिर से सत्ता में वापसी की, और उनके शासन में अलगाववाद बढ़ा।
फिर राजीव गांधी आए, जिन्होंने लोकसभा चुनाव में एक रिकॉर्ड जीत हासिल की। उन्होंने आधुनिकता और नई पीढ़ी के लिए कई प्रयोग किए। लेकिन उनके समय में भी धोखाधड़ी हुई। बोफोर्स घोटाले ने कांग्रेस को संकट में डाल दिया।
इसके बाद वीपी सिंह ने लोगों की उम्मीदें जगाईं, लेकिन सत्ता में आते ही उन्होंने भी अपने वादों को भुला दिया।
नरसिंह राव ने संकट के समय में भारत को संभाला, लेकिन उसके बाद के प्रधानमंत्रियों के समय में भी उम्मीदें कम होती गईं।
अब, 2014 में नरेंद्र मोदी के आगमन के साथ, लोगों को एक नई आज़ादी की उम्मीद थी। लेकिन आज, 12 साल बाद, क्या भारत की स्थिति वैसी है जैसी उम्मीद की गई थी? क्या अच्छे दिन आए हैं या बुरे? आज भारत की आबोहवा क्या है? क्या आम भारतीय की स्थिति में सुधार हुआ है?
भारत की आज की स्थिति पर विचार करें। क्या हम सच में उस दिशा में बढ़ रहे हैं, जिसकी उम्मीद की गई थी? क्या हम सच में एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर राष्ट्र बन पाए हैं?