भारत की विदेश नीति: आत्ममुग्धता और व्यापारिक दृष्टिकोण
भारत की व्यापारिक स्थिति
भारत के लिए अन्य देशों की प्राथमिकता केवल व्यापारिक सौदों तक सीमित रह गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि हमारे पास और कुछ नहीं है। देश के भीतर भी हम केवल व्यापार, सत्ता और वैध लूटपाट में लगे हुए हैं।
हाल ही में, एक प्रमुख भाजपा नेता ने एक अमेरिकी अकादमी में यह सवाल उठाया कि भारत द्वारा अमेरिका के अनुरोधों को मानने के बावजूद, अमेरिकी प्रशासन की नाखुशी का कारण क्या है। उन्होंने उदाहरण दिया कि भारत ने ईरान और रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया, फिर भी अमेरिका ने भारत पर भारी टैरिफ लगाया।
यह प्रश्न महत्वपूर्ण है, और भारतीय नागरिकों को इस पर विचार करना चाहिए कि समस्या कहाँ है। क्या यह पहली बार है कि किसी भारतीय नीति या नेता को सम्मान नहीं मिला?
भारत के मुस्लिम नेता इस प्रकार की उपेक्षा से मुक्त हैं। वे न तो अपनी उपेक्षा का प्रदर्शन करते हैं और न ही सम्मान की लालसा दिखाते हैं।
राजनीति में यह गुण आवश्यक है कि आप अपनी इच्छाओं को छिपा सकें। हिन्दू नेताओं में यह कमजोरी देखी गई है, जो गाँधीजी के समय से चली आ रही है।
गाँधीजी ने कई बार अपनी कमजोरी को प्रदर्शित किया, लेकिन उन्होंने यह नहीं समझा कि दूसरे लोग उनके व्यवहार को कैसे देख रहे हैं।
हिन्दू नेताओं की यह कमजोरी रही है कि वे अपनी स्थिति को दूसरों की नजर से समझने में असमर्थ रहे हैं। यह आत्ममुग्धता राजनीति में हानिकारक साबित होती है।
इस प्रकार की आत्मकेंद्रिकता ने हिन्दू नेताओं को कई महत्वपूर्ण मुद्दों से दूर रखा है।
गाँधीजी के कई अभियानों में यह स्पष्ट हुआ कि वे अपने प्रतिद्वंद्वियों की चालाकियों को समझने में असफल रहे।
हिन्दू नेताओं की यह बचकानी भूल राजनीति में अक्षम्य है। इससे लाखों लोगों की किस्मत प्रभावित हो सकती है।
आज भी, भाजपा नेता अपनी नाखुशी व्यक्त कर रहे हैं। राजनीति में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।
हिन्दू नेताओं को अपनी बौद्धिक और चारित्रिक कमजोरियों को स्वीकार करना चाहिए।
इसलिए, वे बड़े-बड़े काम करने की कोशिश करते रहते हैं, लेकिन वास्तविकता से दूर रहते हैं।