भारत-चीन संबंधों में भाषाई आदान-प्रदान का महत्व
भारत के राजदूत का भाषाई ज्ञानवर्धन पर जोर
(चीन में भारतीय राजदूत विक्रम दुरईस्वामी ने बताया कि दो सहस्राब्दियों से अधिक समय से भाषाओं का आपसी ज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान भारत और चीन के संबंधों की एक महत्वपूर्ण विशेषता रही है। पिछले महीने चीन में भारत के राजदूत के रूप में कार्यभार ग्रहण करने वाले दुरईस्वामी ने शुक्रवार को ‘बीजिंग फॉरेन स्टडीज यूनिवर्सिटी’ (बीएफएसयू) का दौरा किया। वहां उन्होंने एक व्याख्यान दिया और छात्रों तथा संकाय सदस्यों के साथ संवाद किया।
बीएफएसयू, जो चीन में विदेशी भाषाओं का प्रमुख संस्थान है, में तमिल, हिंदी, बंगाली, संस्कृत और उर्दू सहित 102 भाषाओं के पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। हाल ही में, इस संस्थान ने अपने पाठ्यक्रमों में पंजाबी को भी जोड़ा है। ये भाषाएं मुख्य रूप से चीनी छात्रों, राजनयिकों और अधिकारियों को सिखाई जाती हैं।
दुरईस्वामी, जो धाराप्रवाह मंदारिन बोलते हैं, ने अपने व्याख्यान में इस बात पर जोर दिया कि भारत-चीन संबंधों में ज्ञान और विचारों का आदान-प्रदान दो सहस्राब्दियों से एक महत्वपूर्ण विशेषता रही है।
बीजिंग स्थित भारतीय दूतावास ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘मौर्य काल से लेकर आधुनिक युग तक के उदाहरणों का उल्लेख करते हुए, दुरईस्वामी ने बताया कि कैसे दुनिया की दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच आदान-प्रदान ने ज्ञान, दर्शन, कला, प्रौद्योगिकी और नवाचार को साझा करने के माध्यम से दोनों समाजों को समृद्ध किया है।’’ इसमें यह भी कहा गया कि ‘‘ऐतिहासिक रूप से इस प्रकार की बातचीत से दोनों पक्षों को लाभ मिला है।