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भारत-थाईलैंड रक्षा सहयोग: एक नई रणनीतिक साझेदारी का उदय

भारत और थाईलैंड के बीच हाल ही में हुई सहमति एक नई रणनीतिक साझेदारी की ओर इशारा करती है। इस सहयोग में साझा रक्षा निर्माण, अनुसंधान और नवाचार पर जोर दिया गया है। ब्राजील की इमरार कंपनी ने भी भारत को मध्य परिवहन विमानों के लिए एक बड़ा प्रस्ताव दिया है। इस लेख में जानें कि कैसे ये विकास भारत की रक्षा क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा में योगदान कर सकते हैं।
 

भारत और थाईलैंड के बीच रक्षा सहयोग

भारत और थाईलैंड के बीच हाल ही में हुई सहमति एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकती है। ब्राजील, जो भारत का मित्र है, भी ऐसे योजनाओं पर काम कर रहा है जो रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकती हैं। चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, थाईलैंड भी सतर्क है, खासकर दक्षिण चीन सागर में बढ़ते खतरों को देखते हुए। हाल ही में आयोजित एक महत्वपूर्ण रक्षा संवाद में, दोनों देशों ने 2025 तक अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी का दर्जा देने का निर्णय लिया है।


इस बैठक में साझा रक्षा निर्माण, अनुसंधान और नवाचार पर जोर दिया गया। दोनों देशों के बीच सैन्य और प्रशिक्षण आदान-प्रदान को बढ़ाने की योजना बनाई गई है। यदि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ता है, तो यह दोनों देशों को हिंद महासागर और दक्षिण चीन सागर में महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति में रखेगा।


बैठक में समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद, समुद्री डकैती और अवैध तस्करी के खिलाफ संयुक्त प्रयासों पर भी चर्चा की गई। भारत को थाईलैंड को रक्षा उपकरण बेचने का अवसर मिल सकता है, जिससे मेक इन इंडिया अभियान को बढ़ावा मिलेगा।


इसके अलावा, रक्षा, स्टार्टअप और तकनीक में सहयोग को बढ़ाने की योजना है। ब्रह्मोस मिसाइल, जो एक गेम चेंजर है, थाईलैंड के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन सकता है।


भारत और थाईलैंड के बीच नियमित सैन्य संपर्क और आर्थिक रक्षा सहयोग में वृद्धि हो रही है, जिससे दोनों देशों के लिए लाभकारी स्थिति बन रही है।


ब्राजील का बड़ा ऑफर

ब्राजील की इमरार कंपनी ने मध्य परिवहन विमान कार्यक्रम के लिए C390 मिलेनियम विमान का प्रस्ताव दिया है। यदि भारत इसे स्वीकार करता है, तो कंपनी भारत में अपनी पूरी असेंबली लाइन स्थापित करने के लिए तैयार है।


भारत को 60 से 80 मध्य परिवहन विमानों की आवश्यकता है, और इस प्रस्ताव से भारतीय वायुसेना के पुराने AN32 विमानों की जगह नई तकनीक लाई जा सकेगी।


इससे भारत में विमान निर्माण क्षमता में वृद्धि होगी और एयररोस्पेस क्षेत्र में तकनीक और कौशल का स्थानांतरण होगा, जिससे हजारों रोजगार के अवसर पैदा होंगे।