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भारत-नेपाल सीमा विवाद: बालेन शाह के बयान से फिर गरमाई राजनीति

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया बयान ने भारत-नेपाल सीमा विवाद को एक बार फिर से सुर्खियों में ला दिया है। उन्होंने संसद में कहा कि नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया है, जिसके बाद नेपाल में राजनीतिक हलचल मच गई। इस विवाद की जड़ें 1816 की सुगोली संधि तक जाती हैं, जिसने सीमा निर्धारित की थी। जानें इस मुद्दे की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति के बारे में।
 

भारत और नेपाल के बीच पुराना सीमा विवाद

सरहद पर खींची गई रेखाएं कभी-कभी देशों के रिश्तों में दरार डाल देती हैं। भारत और नेपाल के बीच भी ऐसा ही एक मामला है, जो लगभग 200 साल पुराना है। हाल ही में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में एक विवादास्पद बयान दिया, जिसके बाद उनकी सरकार को सफाई देने की आवश्यकता पड़ी। बालेन शाह ने कहा कि केवल भारत ने ही नेपाल की भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि नेपाल ने भी कुछ स्थानों पर भारतीय भूमि पर कब्जा किया है। उनके इस बयान के बाद नेपाल में राजनीतिक हलचल मच गई, विपक्ष ने सबूत मांगे और पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ने सवाल उठाए। पूर्व राजदूतों ने भी इस दावे को खारिज कर दिया। स्थिति इतनी बिगड़ गई कि नेपाल के विदेश मंत्रालय को तुरंत स्पष्टीकरण जारी करना पड़ा। मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री बालेन का आशय भारत की भूमि पर नेपाल के आधिकारिक कब्जे से नहीं था, बल्कि वह 10 गजा की बात कर रहे थे।


10 गजा का विवाद और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

10 गजा का मतलब है वह नो मैनस लैंड जो सीमा पर स्थित है, जहां कुछ लोग वर्षों से खेती कर रहे हैं और कुछ स्थानों पर मकान भी बन गए हैं। नेपाल सरकार का कहना है कि प्रधानमंत्री बालेन शाह इसी प्रकार के क्रॉस बॉर्डर अतिक्रमण की बात कर रहे थे। लेकिन इस विवाद की जड़ें 1816 की सुगोली संधि तक जाती हैं, जिसने नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सीमा निर्धारित की थी। उस समय सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदियों के आधार पर तय किया गया था, और सबसे बड़ा विवाद काली नदी को लेकर है। समय के साथ नदी का मार्ग बदल गया, लेकिन नक्शे और दावे अब भी वही हैं। यही कारण है कि काला पानी, लिपुलेख और सुस्ता जैसे क्षेत्रों पर विवाद उत्पन्न हुआ। नेपाल का दावा है कि काली नदी का वास्तविक स्रोत उसके क्षेत्र से निकलता है, जबकि भारत इसे अपने आधिकारिक क्षेत्र का हिस्सा मानता है।


नए राजनीतिक नक्शे का विवाद

2020 में नेपाल ने एक नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें काला पानी, लिपुलेख और अन्य क्षेत्रों को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया। भारत ने इस कदम को एकतरफा कार्रवाई बताते हुए खारिज कर दिया। हाल के वर्षों में लिपुलेख को लेकर विवाद और बढ़ गया है। खासकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग को लेकर नेपाल ने कई बार आपत्ति जताई है। हालांकि, भारत ने इस मामले में अपना रुख स्पष्ट रखा है। दिलचस्प बात यह है कि बालेन शाह के हालिया बयान पर भारत ने कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी है, जिससे यह संकेत मिलता है कि नई दिल्ली इस मुद्दे को कूटनीतिक विवाद में नहीं बदलना चाहती।


भारत-नेपाल के रिश्ते और सीमा विवाद

भारत और नेपाल की सीमा लगभग 1880 किलोमीटर लंबी है, और विशेषज्ञों के अनुसार 97% सीमा पहले से तय और स्वीकार की जा चुकी है। विवाद केवल कुछ छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों को लेकर है। यही कारण है कि 200 साल बाद भी यह विवाद समाप्त नहीं हो पाया है। यह केवल भूमि का सवाल नहीं है, बल्कि इतिहास, नक्शे और राष्ट्रीय दावों का भी सवाल है। आज भी एक सवाल उठता है कि यदि 97% सीमा विवाद सुलझ चुका है, तो बाकी के 3% में ऐसा क्या है जो भारत और नेपाल के रिश्तों में तनाव पैदा करता है।