भारत-पाकिस्तान संघर्ष: अमेरिका की भूमिका और पाकिस्तान की कूटनीतिक चालें
भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष
हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच एक गंभीर संघर्ष हुआ, जिसमें भारत ने ऑपरेशन सिंदूर का संचालन किया। इस ऑपरेशन के तहत पाकिस्तान में स्थित आतंकवादी ठिकानों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया। इसके बाद, दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम की घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा की गई। इस घोषणा के बाद, यह चर्चा शुरू हुई कि क्या यह युद्ध विराम अमेरिका के राष्ट्रपति की मध्यस्थता से संभव हुआ। भारत ने इस बात को पूरी तरह से खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि इस सीज फायर में किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की गई।
पाकिस्तान की प्रतिक्रिया
पाकिस्तान ने ट्रंप को 'पीस प्रेसिडेंट' के नाम से संबोधित करना शुरू कर दिया। इसके साथ ही, उन्होंने 2025 में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार के लिए ट्रंप की उम्मीदवारी का समर्थन भी किया। रिपोर्टों के अनुसार, पाकिस्तान ऑपरेशन सिंदूर के दौरान इतनी चिंतित था कि उसने ट्रंप से तत्काल बैठक के लिए 45 करोड़ रुपये खर्च किए। इसके अलावा, पाकिस्तान के अधिकारियों ने ट्रंप और अन्य उच्च अधिकारियों से संपर्क करने के लिए 60 से अधिक बार प्रयास किए।
कूटनीतिक प्रयासों में तेजी
एक दस्तावेज़ से पता चलता है कि इस्लामाबाद ने अमेरिका में पैरवी और सार्वजनिक नीति प्रचार पर 9 लाख डॉलर खर्च किए। यह थिंक टैंक पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा विभाग से जुड़ा हुआ है। दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख किया गया है कि वाशिंगटन स्थित पाकिस्तानी दूतावास ने एक अनुबंध किया है, जिसमें अमेरिकी सरकार से संपर्क करने की गतिविधियाँ शामिल हैं।
पाकिस्तान का बढ़ता कर्ज
पाकिस्तान वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के 7 अरब डॉलर के कार्यक्रम के तहत है, जो उसका 24वां कार्यक्रम है। इससे पहले, 3 अरब डॉलर का एक अल्पकालिक समझौता उसे 2023 में दिवालियापन से बचाने में मददगार साबित हुआ। दस्तावेज़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान ने भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर और आतंकवादी ढांचे को निशाना बनाए जाने के बावजूद, अंतर्राष्ट्रीय जवाबदेही से बचने की कोशिश की है।