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भारत में चुनावी प्रक्रिया पर सवाल: मतदाता सूची की शुद्धता पर चिंता

भारत में हाल के लोकसभा चुनावों के बाद, चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची में 13 करोड़ नामों के कटने की जानकारी सामने आई है। यह स्थिति चुनाव की शुचिता पर गंभीर सवाल उठाती है। क्या इतने गलत नामों के आधार पर हुए चुनाव की वैधता को चुनौती दी जा सकती है? इस लेख में हम इस मुद्दे की गहराई में जाएंगे और जानेंगे कि चुनाव आयोग को इस पर क्या कदम उठाने चाहिए।
 

चुनाव आयोग की मतदाता सूची में विसंगतियाँ

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को 63 सीटों का नुकसान हुआ, जिससे उनकी सीटें 303 से घटकर 240 रह गईं। वहीं, विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' को 204 सीटें मिलीं, जबकि ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने 29 सीटें हासिल कीं। यह चुनाव भारत के इतिहास में विपक्ष की सबसे मजबूत उपस्थिति का प्रतीक था। एक साल बाद, चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया शुरू की, जो बिहार में जून 2025 में शुरू होकर तीन महीने में पूरी हुई। नवंबर में नई मतदाता सूची के आधार पर चुनाव हुए, जिसमें एनडीए को 243 में से 202 सीटें मिलीं। वर्तमान में, एसआईआर का तीसरा चरण चल रहा है, जिसमें 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्य किया जा रहा है।


चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, तीन चरणों में लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। 2024 के चुनाव में लगभग 100 करोड़ मतदाता थे, और अनुमान है कि लगभग 14 प्रतिशत मतदाताओं के नाम एसआईआर में कट गए हैं। यदि बाकी राज्यों में भी नाम कटते हैं, तो यह संख्या और बढ़ सकती है। अब सवाल यह उठता है कि इतनी गलतियों के साथ जो चुनाव हुआ, उसकी शुचिता की क्या गारंटी है? यह स्पष्ट नहीं है कि इन गलत नामों का लाभ किसे मिला। 'एब्सेंट, शिफ्टेड, डेड एंड डुप्लीकेट' श्रेणी के मतदाताओं के बोगस वोट डालने का मामला भी गंभीर है। भारत में ऐसा संभव नहीं है कि इस तरह की मतदाता सूची पर चुनाव रद्द न हो, लेकिन चुनाव आयोग को इस पर एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए।