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भारत में नागरिकता का सवाल: मोदी सरकार की नई बहस

मोदी सरकार ने नागरिकता के मुद्दे पर एक नई बहस शुरू की है, जिसमें पूछा गया है कि भारत का नागरिक कौन है। क्या पासपोर्ट, आधार कार्ड या वोटर कार्ड नागरिकता का प्रमाण हैं? इस लेख में हम इस जटिल मुद्दे पर चर्चा करेंगे और जानेंगे कि क्या वास्तव में भारत में नागरिकता के ठोस प्रमाण मौजूद हैं। क्या यह बहस केवल राजनीतिक है या इसके पीछे गहरे सांस्कृतिक मुद्दे भी हैं? जानें इस महत्वपूर्ण विषय पर और अधिक।
 

भारत का नागरिक कौन?


मोदी सरकार ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है: भारत का नागरिक कौन है? क्या नरेंद्र मोदी, अमित शाह और मोहन भागवत भारत के नागरिक हैं? उनके पास नागरिकता के प्रमाण क्या हैं? यह सोचने का विषय है, खासकर हिंदुओं के लिए। पहले इन्होंने संसद और विधानसभाओं में वंदे मातरम् का गान अनिवार्य किया और अब यह बता रहे हैं कि किसी के पास नागरिकता का ठोस प्रमाण नहीं है। मुझे लगता था कि पासपोर्ट होना ही नागरिकता का प्रमाण है, क्योंकि इसमें जन्मस्थान, तारीख, परिवार और वंश का उल्लेख होता है। विश्व के एयरपोर्ट पर इसे भारत के नागरिक होने का दस्तावेज माना जाता है।


अब मोदी सरकार ने कहा है कि पासपोर्ट भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है। सोचिए, 15 अगस्त 1947 के बाद के स्वतंत्र भारत के नागरिकों की स्थिति पर। लोग राशन कार्ड, पैन कार्ड, इनकम टैक्स, पासपोर्ट और वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन कोई भी दस्तावेज नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं है।


पिछले बारह वर्षों में संघ और भाजपा ने हिंदू समाज में यह धारणा स्थापित की है कि भारत केवल एक भूखंड नहीं, बल्कि मातृभूमि है। राष्ट्रभक्ति केवल संवैधानिक निष्ठा नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आस्था है। वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना है। यदि ऐसा है, तो राष्ट्र अपने नागरिकों से पहचान का प्रमाण क्यों मांगता है? क्या मातृभूमि अपने ही संतान से कहेगी कि पहले अपनी पहचान साबित करो?


हम हिंदू भारत की मिट्टी से सभ्यतागत पहचान रखते हैं। इस संदर्भ में राष्ट्र और राज्य का अर्थ क्या है? क्या मनुष्य पहले पैदा हुआ या राज्य? धर्म और सभ्यता पहले हैं या 1950 में बना भारत गणराज्य? भारत ने समाज नहीं बनाया, तब राष्ट्र कौन है जो नागरिकता का मालिक मानकर कह रहा है कि इस भूमि में रहने का अधिकार प्रमाणित करना होगा?


भारत अपने ही नागरिकों को भीड़ और लावारिस भेड़-बकरी की तरह देख रहा है। उसे जन्मभूमि में जन्मे लोगों के लिए प्रामाणिक दस्तावेज चाहिए, जो किसी के पास नहीं है।


मेरा मानना है कि इस बहस से गृहमंत्री अमित शाह नागरिकता कार्ड बनाने का नया तामझाम शुरू करेंगे। कौन नागरिक है और कौन नहीं, इस पर बहस कर हिंदू बनाम मुस्लिम राजनीति का नया धंधा खड़ा करेंगे, जिससे अगले दस-बीस सालों तक भगवा राजनीति को बढ़ावा मिलेगा।