भारत में राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक ध्रुवीकरण: एक विश्लेषण
राजनीतिक आंदोलनों का संदर्भ
किसान आंदोलन, गुजरात के युवा पटेलों का संघर्ष, और शाहीन बाग की घटनाओं को याद करें। इन आंदोलनों के दौरान मीडिया ने अराजकता की छवि पेश की। दिल्ली-यूपी सीमा पर कानून व्यवस्था को खतरा बताया गया। किसान देशभर में आंदोलन कर रहे थे, और सिंधू बॉर्डर पर अव्यवस्था की तस्वीरें सामने आईं। मोदी के खिलाफ आंदोलनों की एक निरंतरता है, जिसमें विभिन्न समुदायों के लोग शामिल हैं।
इस संदर्भ में, मोदी-शाह की सरकार की रणनीतियों का विश्लेषण करना आवश्यक है। यह स्पष्ट है कि वे राजनीतिक लाभ के लिए समाज में विभाजन को बढ़ावा दे रहे हैं।
इस प्रकार, पिछले बारह वर्षों में, यह देखा गया है कि मुसलमान अपने विश्वासों के प्रति दृढ़ हैं, जबकि हिंदू समुदाय में भक्ति का अंधापन देखा गया है। यह भक्ति ही है जो उन्हें गुलामी के इतिहास से जोड़ती है।
क्या यह सही है कि पिछले 12 वर्षों में मोदी के अलावा कोई अन्य नेता उभरा है? मनमोहन सिंह के समय में भारत की विविधता और मानवता को याद करें। तब भारत में नागरिकों की पहचान और अधिकारों का सम्मान था।
निष्कर्ष
इसलिए, 13 प्रधानमंत्रियों के भारत और नरेंद्र मोदी के शासन के बीच का अंतर स्पष्ट है। मनमोहन सिंह के समय में भारत मानवता का देश था, जबकि मोदी के शासन में इसे कॉकरोचों का देश कहा जा रहा है। यह स्थिति उत्तर भारत के युवाओं के लिए चुनौतीपूर्ण है, और सरकार ने पुलिस को असीमित अधिकार दिए हैं।