भारत में लो-फ्लोर बसों का अनिवार्य होना: एक नई शुरुआत
नई दिल्ली में परिवहन में बदलाव
नई दिल्ली: भारत सरकार ने शहरी सार्वजनिक परिवहन को अधिक सुलभ और समावेशी बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है।
सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नए ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के अनुसार, अक्टूबर 2026 से सभी शहरों में केवल लो-फ्लोर बसों का संचालन किया जाएगा। यह निर्णय यात्रियों की सुविधा, विशेषकर बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और दिव्यांगों के लिए लिया गया है।
इस बदलाव की आवश्यकता
वर्तमान में, भारत के कई शहरों में 'हाई-फ्लोर' या 'सेमी-लो-फ्लोर' बसें चल रही हैं। इनमें ऊंची सीढ़ियां और संकरे रास्ते होते हैं, जिससे चढ़ना और उतरना मुश्किल हो जाता है। मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया कि अब बसों का इकोसिस्टम पूरी तरह से तैयार है और निर्माता पहले से ही लो-फ्लोर बसों का निर्माण कर रहे हैं। इसे अब एक मानक कानून (AIS-216) के तहत अनिवार्य किया जा रहा है।
सुरक्षा और सुविधा के नए मानक
ऑटोमोटिव इंडस्ट्री स्टैंडर्ड (AIS-216) का पालन करने से बसें न केवल अधिक आरामदायक होंगी, बल्कि सुरक्षा के मामले में भी बेहतर होंगी। लो-फ्लोर बसों से व्हीलचेयर का उपयोग करने वाले यात्रियों को बस में चढ़ने में आसानी होगी। बस की फ्लोर हाइट कम होने से यात्री जल्दी चढ़ और उतर सकेंगे, जिससे स्टॉपेज पर लगने वाला समय कम होगा और बसें समय पर चल सकेंगी।
नए नियम और समयसीमा
सरकार ने इस बदलाव के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार किया है:
नए मॉडल्स के लिए: 1 अप्रैल, 2026 के बाद निर्मित सभी नए मॉडल्स को इन मानकों का पालन करना होगा।
मौजूदा मॉडल्स के लिए: 1 अक्टूबर, 2026 के बाद निर्मित सभी मौजूदा मॉडल की बसों के लिए लो-फ्लोर होना अनिवार्य होगा।
मानक: 9 मीटर या उससे अधिक लंबी सभी नई सिटी बसों की फ्लोर हाइट अब 400 mm और ग्राउंड क्लीयरेंस 440 mm निर्धारित की गई है।
लागत की चुनौती का समाधान
अब तक, कई छोटे शहर कम बजट और प्रारंभिक लागत के कारण हाई-फ्लोर बसें खरीदने को प्राथमिकता देते थे। सरकार के इस सख्त आदेश के बाद, बस निर्माताओं को केवल लो-फ्लोर तकनीक पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जिससे भविष्य में इनकी लागत में कमी आने की संभावना है।