भूपेश बघेल की पंजाब से विदाई: कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का असर
भूपेश बघेल की नई जिम्मेदारी
पंजाब में विधानसभा चुनावों में अब केवल छह महीने बचे हैं, और कांग्रेस ने अपने प्रभारी को बदलने का निर्णय लिया है। छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पंजाब से हटाकर असम भेजा गया है, जहां हाल ही में चुनाव हुए थे। यह कदम यह संकेत देता है कि उन्हें पार्टी की प्राथमिकताओं से हटा दिया गया है। पंजाब में चुनावों के लिए प्रभारी का कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता है, खासकर जब लोकसभा चुनाव भी दूर हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि भूपेश बघेल को पंजाब से हटाने का कारण क्या है? और क्या सचिन पायलट, जो अब पंजाब के प्रभारी हैं, वहां कुछ खास कर पाएंगे?
भूपेश बघेल की विदाई को दो दृष्टिकोणों से देखा जा रहा है। एक तो उनकी राजनीतिक शैली, जो कि काफी आक्रामक मानी जा रही है, और दूसरा कांग्रेस के भीतर की राजनीति। पहले कारण को अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी के कुछ नेताओं का मानना है कि बघेल पंजाब में प्रभारी के रूप में नहीं, बल्कि एक प्रमुख नेता के रूप में कार्य कर रहे थे। वे सीधे प्रदेश की राजनीति में हस्तक्षेप कर रहे थे, जो कि उनके पद के अनुरूप नहीं था।
कांग्रेस आलाकमान, जिसमें राहुल गांधी शामिल हैं, चाहते थे कि अमरिंदर सिंह राजा वारिंग को प्रदेश अध्यक्ष बनाए रखा जाए, लेकिन बघेल ने इस प्रक्रिया में कई नेताओं को नाराज कर दिया। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी और सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे नेता भी इससे असंतुष्ट थे। यहां तक कि विधायक दल के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने भी इस विवाद में अपनी नाराजगी व्यक्त की। कांग्रेस को यह चिंता है कि पंजाब में स्थिति हरियाणा जैसी न बन जाए, जहां भूपेंद्र सिंह हुड्डा के रवैये के कारण दलित वोट बैंक प्रभावित हुआ। पंजाब में दलितों की संख्या लगभग 33 प्रतिशत है, और केवल जाट सिख वोटों पर निर्भर रहना कांग्रेस के लिए कठिन होगा। अब यह जिम्मेदारी सचिन पायलट पर है कि वे इस समीकरण को बनाए रखें।