ममता बनर्जी ने मतदाता सूची में खामियों पर उठाया सवाल
मुख्यमंत्री का पत्र
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के प्रमुख ज्ञानेश कुमार को एक पत्र भेजकर एसआईआर के दौरान मतदाता सूची में हो रही गंभीर प्रक्रियात्मक खामियों पर अपनी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि वर्तमान प्रक्रिया के कारण आम नागरिकों को अनावश्यक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और कई योग्य मतदाताओं के नाम गलत तरीके से सूची से हटा दिए जा रहे हैं, जो उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
सुनवाई नोटिस की समस्या
ममता बनर्जी ने पत्र में उल्लेख किया कि जिन मतदाताओं को सुनवाई नोटिस भेजे जा रहे हैं, वे पहले से ही वर्ष 2002 की मतदाता सूची में स्वयं या अपने परिजनों के माध्यम से पंजीकृत हैं। ऐसे मामलों में सुनवाई नोटिस जारी करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इससे मतदाताओं में भ्रम उत्पन्न हो रहा है और उन्हें मानसिक और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
फील्ड टीमों की स्थिति
इन नोटिसों के कारण फील्ड में काम कर रही टीमों को भी जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि मतदाता इसे बिना किसी गलती के उत्पीड़न मान रहे हैं।
प्रक्रिया में खामियां
मुख्यमंत्री ने एसआईआर के दौरान सामने आई दो प्रमुख खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया। पहली खामी यह है कि सुनवाई के दौरान मतदाता अपनी पात्रता से संबंधित सभी आवश्यक दस्तावेज जमा कर रहे हैं, लेकिन कई मामलों में इन दस्तावेजों की कोई पावती या रसीद नहीं दी जा रही। जब सत्यापन या अगली सुनवाई होती है, तो वही दस्तावेज 'रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं' बताए जाते हैं, जिसके आधार पर मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए जाते हैं। ममता बनर्जी ने इसे पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य प्रक्रिया बताया।
दस्तावेजों की रसीद का अभाव
उन्होंने कहा कि दस्तावेजों की रसीद न देना मतदाताओं को असहाय बना देता है और उन्हें प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होना पड़ता है। यह प्रक्रिया तकनीकी औपचारिकताओं पर आधारित हो गई है, जिसमें विवेकपूर्ण निर्णय का अभाव है। इससे एसआईआर का मूल उद्देश्य विफल हो रहा है, जिसका मकसद मतदाता सूची को शुद्ध और मजबूत बनाना है, न कि वास्तविक और पात्र मतदाताओं को बाहर करना।
डिजिटलीकरण की समस्याएं
दूसरी बड़ी खामी के रूप में मुख्यमंत्री ने 2002 की मतदाता सूचियों के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया का जिक्र किया। उन्होंने बताया कि पुराने, गैर-डिजिटाइज्ड मतदाता रिकॉर्ड को एआई टूल के जरिए स्कैन और अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया गया, जिसमें नाम, उम्र, लिंग, रिश्ते और अभिभावक के नाम जैसी जानकारियों में गंभीर गलतियां हुईं। इन त्रुटियों के कारण बड़ी संख्या में मतदाताओं को 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' की श्रेणी में डाल दिया गया।
पुनः पहचान की मांग
ममता बनर्जी ने यह भी कहा कि पिछले 23 वर्षों में कई मतदाताओं ने फॉर्म-8 के जरिए अपने विवरण सही कराए थे, जिन्हें विधिसम्मत सुनवाई के बाद चुनाव अधिकारियों ने मंजूरी दी थी और वे 2025 की मतदाता सूची में शामिल हैं। इसके बावजूद, अब चुनाव आयोग उन्हीं मतदाताओं से दोबारा पहचान और पात्रता साबित करने को कह रहा है, जो पूरी तरह मनमाना और असंवैधानिक है।
प्रक्रिया पर सवाल
मुख्यमंत्री ने सवाल उठाया कि यदि प्रक्रिया को फिर से 2002 पर ले जाया जा रहा है, तो क्या इसका मतलब यह है कि पिछले दो दशकों में किए गए सभी संशोधन अवैध थे?
छोटी त्रुटियों का समाधान
उन्होंने कहा कि नाम या उम्र में मामूली अंतर जैसे 'केआर' और 'कुमार' या 'शेख' और 'एसके' जैसी त्रुटियों को बिना सुनवाई के, टेबल-टॉप स्तर पर ही सुलझाया जा सकता है।
चुनाव आयोग से अपील
बनर्जी ने चुनाव आयोग से अपील की कि वह इन मुद्दों पर तत्काल ध्यान दे ताकि नागरिकों की पीड़ा समाप्त हो, प्रशासनिक तंत्र पर अनावश्यक दबाव न पड़े, और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो सके।