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महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान: ग्वालियर की लड़ाई और विश्वासघात की कहानी

महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान और ग्वालियर की लड़ाई भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक है। इस लेख में, हम जानेंगे कि कैसे महारानी ने ब्रिटिश साम्राज्य और स्वदेशी गद्दारों के खिलाफ संघर्ष किया। ग्वालियर का किला सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, और यहां की घटनाएं आज भी चर्चा का विषय हैं। जानिए कैसे विश्वासघात ने इस संघर्ष को प्रभावित किया और किस प्रकार क्षेत्रीय राजाओं की भूमिका ने इस लड़ाई को आकार दिया।
 

महारानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष


झांसी और कालपी के पतन के बाद, महारानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे और राव साहब ने ग्वालियर की ओर कदम बढ़ाया। उस समय ग्वालियर का किला सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था। यहां की घटनाएं भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित और विवादास्पद अध्यायों में से एक मानी जाती हैं। सावरकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक '1857 का स्वातंत्र्य समर' में उल्लेख किया है कि यदि सिंधिया की सेना और संसाधन पूरी तरह से क्रांतिकारियों के पक्ष में होते, तो संभवतः भारत 1857 में ही स्वतंत्र हो जाता।


झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान एक ऐसी घटना है, जो एक ओर राष्ट्रगौरव की ऊंचाई को दर्शाती है, वहीं दूसरी ओर आंतरिक विश्वासघात की दर्दनाक तस्वीर भी पेश करती है। 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम की इस महानायिका को न केवल ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत से लड़ना पड़ा, बल्कि स्वदेशी गद्दारों और अवसरवादी सामंतों की साजिशों का भी सामना करना पड़ा।


ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि झांसी के युद्ध में ब्रिटिश सेनापति जनरल ह्यूरोज की सेना महारानी के अभेद्य प्रतिरोध से हतोत्साहित हो चुकी थी। दुर्ग की प्राचीरों पर तैनात सैनिक अंग्रेजों पर काल बनकर टूट रहे थे। ऐसे निर्णायक समय में स्वार्थ और लालच के कारण विश्वासघात ने जन्म लिया। झांसी की सेना में एक विश्वस्त तोपची और द्वार रक्षक दूल्हाजू (दीवान दूल्हा जू) था। इतिहासकार वृंदावनलाल वर्मा की प्रसिद्ध पुस्तक 'झांसी की रानी' के अनुसार, दूल्हाजू ने अंग्रेजों से धन और भविष्य में जागीर पाने के लालच में गुप्त समझौता कर लिया था।


समझौते के अनुसार, जब ब्रिटिश सेना पराजय के करीब थी, तब 3 अप्रैल 1858 की रात दूल्हाजू ने दुर्ग का ओरछा फाटक चुपचाप अंग्रेजों के लिए खोल दिया। इसके बाद ब्रिटिश सेना किले के भीतर घुस आई। इस विश्वासघात ने लगभग सुनिश्चित विजय को संकट में डाल दिया। परिणामस्वरूप, महारानी को दामोदर राव को पीठ पर बांधकर किले से बाहर निकलना पड़ा।


ग्वालियर के महाराजा जयाजीराव सिंधिया और उनके प्रधानमंत्री सर दिनकर राव ने विचार और व्यवहार दोनों स्तरों पर ब्रिटिश सत्ता का साथ देने का निर्णय लिया। सावरकर ने लिखा है कि यदि सिंधिया की सेना और संसाधन पूरी तरह से क्रांतिकारियों के साथ होते, तो भारत 1857 में स्वतंत्र हो सकता था।


1 जून 1858 को जब महारानी और तात्या टोपे की सेना ग्वालियर पहुंची, तब सिंधिया की सेना के एक बड़े हिस्से, विशेषकर मुरार छावनी के सैनिकों ने महारानी का स्वागत किया और क्रांतिकारियों के साथ मिल गए। इस जनविद्रोह से घबराकर जयाजीराव सिंधिया आगरा जाकर अंग्रेजों की शरण में चले गए।


हालांकि ग्वालियर की सेना का बड़ा हिस्सा क्रांतिकारियों के साथ था, लेकिन प्रशासनिक तंत्र और कुछ प्रभावशाली सामंत गुप्त रूप से अंग्रेजों की मदद करते रहे। आगरा पहुंचने के बाद भी दिनकर राव के माध्यम से ब्रिटिश सेना को ग्वालियर के शस्त्रागार, किले की सुरक्षा व्यवस्था और सैन्य कमजोरियों की जानकारी लगातार भेजी जाती रही। जनरल ह्यूरोज ने अपनी सैन्य डायरी में स्वीकार किया था कि यदि सिंधिया हमारे प्रति निष्ठावान न रहते, तो हमारे पैर उखड़ चुके थे।


लोककथाओं और सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर कविता 'झांसी की रानी' में भी सिंधिया को अंग्रेजों का मित्र बताया गया है। कहा जाता है कि ग्वालियर के अस्तबल से महारानी को जानबूझकर एक कमजोर घोड़ा दिया गया था, जो अंतिम समय में नाले को पार नहीं कर सका।


17-18 जून 1858 को ग्वालियर के निकट कोटाह-की-सराय में कैप्टन हीथकोट और जनरल ह्यूरोज की संयुक्त सेनाओं ने महारानी को घेर लिया। ब्रिटिश दस्तावेजों के अनुसार, कुछ स्थानीय जमींदारों ने अंग्रेजों को महारानी की सटीक स्थिति की जानकारी दी थी।


महारानी लक्ष्मीबाई का संघर्ष केवल झांसी और ग्वालियर तक सीमित नहीं था। कुंच और कालपी के युद्ध मध्य भारत में अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ महत्वपूर्ण सैन्य मोर्चे थे। झांसी के पतन के बाद, महारानी कालपी पहुंचीं, जहां तात्या टोपे और राव साहब की सेनाओं को एकत्र होना था।


कर्नल मालेसन की पुस्तक 'द इंडियन म्यूटिनी ऑफ 1857' के अनुसार, बाणपुर के राजा मर्दन सिंह और शाहगढ़ के राजा बखत बली साधारण विद्रोही नहीं थे। उन्होंने झांसी के पतन से पहले ही जनरल ह्यूरोज की सेना को रोकने के लिए संघर्ष किया था।


कुंच की लड़ाई में क्रांतिकारियों की हार का बड़ा कारण आपसी समन्वय की कमी और भीषण गर्मी थी। स्थानीय सैनिकों के साहस के बावजूद, अंग्रेजों के आधुनिक हथियारों के सामने उनका पारंपरिक तोपखाना कमजोर पड़ गया।


कुंच की पराजय के बाद सभी क्रांतिकारी कालपी में एकत्र हुए। कालपी का किला सामरिक दृष्टि से बेहद मजबूत था। यहां राजा मर्दन सिंह और राजा बखत बली ने महारानी के साथ मिलकर अंतिम सांस तक लड़ने की प्रतिज्ञा की।


22 मई 1858 को महारानी लक्ष्मीबाई, राजा मर्दन सिंह और राजा बखत बली के संयुक्त नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने ऐसा भीषण आक्रमण किया कि ब्रिटिश सेना डगमगाने लगी। लेकिन तभी कर्नल मैक्सवेल के नेतृत्व में ब्रिटिश कैमल कॉर्प्स युद्धक्षेत्र में पहुंच गया।


इतिहास में इन क्षेत्रीय राजाओं की भूमिका अक्सर झांसी की रानी और तात्या टोपे की प्रसिद्धि के पीछे दब जाती है। कालपी और कुंच के युद्ध बताते हैं कि बाणपुर और शाहगढ़ जैसे क्षेत्रीय शासकों में राष्ट्रभक्ति और अंग्रेजों के प्रति गहरा आक्रोश था।


महारानी लक्ष्मीबाई का बलिदान दिवस केवल एक वीरांगना की शहादत का स्मरण नहीं है, बल्कि यह उस कटु सत्य की भी याद दिलाता है कि जब-जब राष्ट्रहित पर व्यक्तिगत स्वार्थ हावी हुए हैं, तब-तब देश को पराजय झेलनी पड़ी है।