महिला आरक्षण कानून और परिसीमन बिल पर विशेष सत्र की चुनौतियाँ
संसद का मौजूदा सत्र और विशेष सत्र की आवश्यकता
संसद का मॉनसून सत्र अभी तक औपचारिक रूप से समाप्त नहीं हुआ है। 13 अगस्त को दोनों सदनों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित किया गया था, और अब तक 82 दिन बीत चुके हैं। यह स्थिति पिछले सभी रिकॉर्ड्स को तोड़ चुकी है। हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह विशेष सत्र बुलाने के लिए दो तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि महिला आरक्षण कानून में संशोधन और परिसीमन बिल को पास किया जा सके। यदि बहुमत नहीं जुटाया जाता है, तो संसद का सत्रावसान भी नहीं हो रहा है। इस बीच, शाह बार-बार राहुल गांधी को चुनौती दे रहे हैं कि सरकार विशेष सत्र बुलाने को तैयार है, जिसमें एसआईआर के मुद्दे पर चर्चा की जा सके। लेकिन विपक्ष इस पर सहमत नहीं हो रहा है।
सरकार के सामने अब एक बड़ी चुनौती है कि विशेष सत्र बुलाने के लिए समय कम बचा है। आमतौर पर नवंबर के तीसरे हफ्ते में संसद का शीतकालीन सत्र शुरू होता है। पहले हफ्ते के अंत या दूसरे हफ्ते की शुरुआत में मंत्रिमंडलीय समिति राष्ट्रपति से शीतकालीन सत्र बुलाने की सिफारिश करती है। इस बीच, त्योहारों का समय भी चल रहा है, जिसमें सरकार विशेष सत्र नहीं बुला सकती। दिवाली, गोवर्धन पूजा, भाई दूज और छठ जैसे त्योहारों के कारण, विशेष सत्र बुलाने का समय सीमित है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि सरकार ने संसद का सत्रावसान क्यों नहीं किया, जबकि उसे पता है कि विशेष सत्र के लिए समय नहीं बचा है।
यह भी आश्चर्यजनक है कि सरकार विशेष सत्र में ही यह काम क्यों कराना चाहती है। पिछले विशेष सत्र में महिला आरक्षण कानून और परिसीमन बिल को पास कराने का प्रयास विफल रहा था। अब, शीतकालीन सत्र में इसे पास कराने के बजाय, संसद को रोका गया है ताकि विशेष सत्र बुलाकर इसे पास किया जा सके। सरकार का उद्देश्य यह है कि महिला आरक्षण और परिसीमन एक महत्वपूर्ण कार्य है, जिसे वह विशेष रूप से कर रही है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए, ऐसा लगता नहीं है कि विशेष सत्र हो पाएगा। इसलिए, सरकार को शीतकालीन सत्र में इसे पास कराने का प्रयास करना चाहिए। यदि सरकार अगले लोकसभा चुनाव से पहले परिसीमन और महिला आरक्षण कानून लागू करना चाहती है, तो समय तेजी से निकलता जा रहा है।