महिला आरक्षण: प्रियंका गांधी का नया नैरेटिव और मोदी सरकार की चुनौतियाँ
महिला आरक्षण का मुद्दा
प्रियंका गांधी का नारी शक्ति पर जोर देना भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है। चाहे नरेंद्र मोदी या भाजपा कितनी भी गणना करें, 2014 से अब तक महिलाओं के वोटों की संख्या भाजपा के लिए अधिकतम रही है। इसका मतलब यह है कि महिला आरक्षण के बावजूद भाजपा को महिलाओं के अतिरिक्त वोट नहीं मिलेंगे। हिंदू भक्ति का चरम अब पीछे छूट चुका है, और देश की आर्थिक स्थिति के संकेत भी खराब हैं, खासकर महिलाओं के लिए। घर की रसोई से लेकर कामकाज तक, आर्थिक संकट का सबसे अधिक असर महिलाओं पर पड़ रहा है। मेरा मानना है कि प्रधानमंत्री ने महिला आरक्षण का कार्ड इसलिए निकाला है ताकि एक नया नैरेटिव तैयार किया जा सके।
चुनावों में महिला आरक्षण का समय
महिला आरक्षण के नाम पर कई जुमले बन सकते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब हिंदू बनाम मुस्लिम का मुद्दा स्थायी है और योगी का बुलडोजर कार्ड भी मजबूत है, तो विधानसभा चुनावों के बीच महिला आरक्षण का मुद्दा क्यों उठाया गया? ऐसा लगता है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद प्रधानमंत्री खुद को असमर्थ महसूस कर रहे हैं। अब न तो पाकिस्तान को ठोक सकते हैं, न चीन को आंखें दिखा सकते हैं, और न ही नोटबंदी जैसी कोई बड़ी घोषणा कर सकते हैं।
चुनाव जीतने की नई चुनौतियाँ
मोदी और अमित शाह यह समझ रहे हैं कि चुनाव जीतने की हेडलाइन अब लोगों में प्रभाव नहीं डालती। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद, वोटर लिस्ट की चर्चा से यह स्पष्ट हो गया है कि चुनाव अब धांधली और प्रबंधन से जीते जाते हैं। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता भी प्रभावित हुई है। इसलिए, नरेंद्र मोदी ने बंगाल चुनाव से पहले महिला शक्ति का यह नया नैरेटिव पेश किया है कि ममता बनर्जी कुछ नहीं देतीं, जबकि मोदी महिलाओं को एमपी और एमएलए बना देंगे।
महिलाओं का समर्थन
हालांकि, बंगाल की महिलाएं ममता बनर्जी को छोड़ने वाली नहीं हैं। देश की महिलाएं इंदिरा गांधी, सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी को भुलाने वाली नहीं हैं। मेरा मानना है कि यदि राहुल गांधी और सोनिया गांधी प्रियंका को प्रचार में सक्रिय करें, तो यह एक बड़ा बदलाव ला सकता है। प्रियंका का नाम, इमेज और भाषण महिलाओं के बीच गूंजेगा, जिससे 2029 के लोकसभा चुनाव में नारी शक्ति एकजुट हो सकती है। उस समय नरेंद्र मोदी भी खुद को ठगा हुआ महसूस कर सकते हैं।