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महिला आरक्षण विधेयक: पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु चुनावों पर प्रभाव

केंद्र सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण विधेयक का पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनावों पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। इस विधेयक के माध्यम से सरकार ने विपक्ष को एकजुट होने का अवसर दिया है, जिससे चुनावी माहौल में बदलाव आया है। ममता बनर्जी और एमके स्टालिन जैसे नेता इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश कर रहे हैं। जानिए कैसे यह विधेयक चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकता है और विपक्ष की एकता को मजबूती दे रहा है।
 

महिला आरक्षण का राजनीतिक प्रभाव

केंद्र सरकार ने महिला आरक्षण के लिए नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन का विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य पश्चिम बंगाल के आगामी चुनावों में लाभ उठाना था। बंगाल एक ऐसा राज्य है जहाँ मातृ शक्ति की पूजा की जाती है, और यदि चुनाव से पहले महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मिल जाता है, तो भाजपा को इसका फायदा हो सकता है। सरकार को यह भी पता था कि विधेयक पास नहीं हो सकता, लेकिन इसे पेश करने का एक और उद्देश्य था कि यदि विपक्ष इसका विरोध करता है, तो चुनाव में इसे प्रचारित कर विपक्ष को कठघरे में खड़ा किया जा सके। हालांकि, इस रणनीति से विपक्ष को एकजुट होने का मौका मिला। डीएमके, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने इस मुद्दे पर कांग्रेस के साथ मिलकर एकजुटता दिखाई। विपक्ष को 238 सांसदों का समर्थन मिला, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी के सात सांसद चुनाव प्रचार में व्यस्त थे।


पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने परिसीमन और महिला आरक्षण को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया है। हालांकि, इससे चुनाव परिणामों की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती, लेकिन भाजपा ने ममता को दो महत्वपूर्ण मुद्दे दे दिए हैं। भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को उत्तरी बंगाल में प्रचार के लिए सक्रिय कर दिया है, जहाँ पहले चरण में मतदान होना है। पिछली बार भाजपा ने 54 सीटों में से 30 सीटें जीती थीं। ममता बनर्जी इस क्षेत्र में प्रचार कर रही हैं कि भाजपा परिसीमन के जरिए इस क्षेत्र को बंगाल से अलग करने की कोशिश कर रही है।


तमिलनाडु में चुनावी बदलाव

तमिलनाडु में भी चुनावी माहौल पूरी तरह से बदल गया है। अब समूचा प्रचार परिसीमन के इर्द-गिर्द घूम रहा है। एमके स्टालिन की पार्टी डीएमके इस मुद्दे पर सबसे मुखर है, जबकि अन्ना डीएमके बैकफुट पर है। भाजपा के नेता परिसीमन का बचाव कर रहे हैं, लेकिन उनकी बातों को कोई नहीं सुन रहा है। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने परिसीमन बिल की कॉपी जलाकर इसका राजनीतिक इस्तेमाल किया है। उन्होंने काले कपड़े पहनकर प्रचार किया और सांसदों ने भी संसद में काले कपड़े पहने। इससे अस्मिता की राजनीति को बल मिला है।