महिलाओं के खिलाफ अपराध: भारत में न्याय की कमी और राजनीतिक हस्तक्षेप
भारत में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की स्थिति
भारत में कानूनों की कमी नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी कार्यान्वयन की कमी है। कई देशों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के लिए कड़ी सजा दी जाती है, जिससे ऐसे अपराधों की संख्या कम होती है। जब तक पुलिस राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं होगी और न्यायालयों में मामलों का निपटारा समय पर नहीं होगा, तब तक अपराधियों को यह संदेश मिलता रहेगा कि सजा की संभावना अनिश्चित है।
महिलाओं के खिलाफ अपराधों की समस्या भारत में नई नहीं है। यह एक पुरानी समस्या है, जो समय-समय पर जघन्य घटनाओं के माध्यम से उजागर होती है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में केवल 1.5 प्रतिशत की गिरावट आई है, जो लगभग 4.41 लाख मामलों के बराबर है। यह गिरावट सांत्वना देने वाली नहीं है।
इसका मतलब है कि लगभग हर 71 सेकंड में एक नया मामला सामने आता है। 2024 में भारत में बलात्कार के 29,536 मामले दर्ज हुए हैं। दिल्ली जैसे महानगरों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की संख्या सबसे अधिक है। चाहे आंकड़े गिरें या न गिरें, लेकिन सड़कें, घर, अस्पताल और पार्क महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं हैं।
पुरानी घटनाएँ आज भी ताजा हैं। दिसंबर 2012 का निर्भया कांड उस पीढ़ी की चेतना का हिस्सा बन गया, जिसके बाद कानूनों में बदलाव हुए, फास्ट ट्रैक अदालतें बनीं और सजाएँ सख्त हुईं। फिर भी, 2017 का उन्नाव मामला यह दर्शाता है कि जब आरोपी सत्ता के करीब होता है, तो पीड़िता का परिवार कैसे टूटता है और न्याय कितना लंबा खिंचता है।
नए मामले पुरानी कहानियों को दोहराते हैं। अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में एक युवा डॉक्टर के साथ बलात्कार और हत्या ने चिकित्सा समुदाय को सड़कों पर ला दिया। एफआईआर में देरी, सबूतों से छेड़छाड़ के आरोप और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ने जांच को जटिल बना दिया।
इन मामलों में सबसे बड़ा अवरोध राजनीतिक हस्तक्षेप है। जब आरोपी किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता होता है, तो एफआईआर दर्ज कराना भी संघर्ष बन जाता है। गवाह मुकर जाते हैं और परिवार को समझौते के लिए दबाव डाला जाता है।
दूसरा बड़ा अवरोध न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति है। बलात्कार के मामलों में अदालतों में लंबितता लगभग 90 प्रतिशत है। 2024 में हजारों मुकदमों में से केवल एक छोटे हिस्से का ही निपटारा हुआ।
इसका समाधान नारे से नहीं, बल्कि व्यवस्था से आएगा। पुलिस की स्वायत्तता और जवाबदेही को सुनिश्चित करना आवश्यक है। महिलाओं के खिलाफ गंभीर अपराधों में एफआईआर दर्ज करने में देरी को दंडनीय माना जाना चाहिए।
शिक्षा और सामाजिक बदलाव की एक लंबी प्रक्रिया है, लेकिन तत्काल आवश्यकता निवारक दंड की निश्चितता की है। सार्वजनिक स्थानों, अस्पतालों और परिवहन में निगरानी को औपचारिकता नहीं बनाना चाहिए।
महिलाओं की सुरक्षा राष्ट्र की परीक्षा है। इसे विफल नहीं होना चाहिए।