मिडिल ईस्ट में अमेरिकी सैनिकों की वापसी: एक नई रणनीति का आगाज़
मिडिल ईस्ट में तनाव और अमेरिकी सैनिकों की वापसी
मिडिल ईस्ट एक बार फिर से संकट के कगार पर है। इजराइल और ईरान के बीच तनाव बढ़ रहा है, जबकि लाल सागर में हमले भी बढ़ रहे हैं। सीरिया की स्थिति अस्थिर बनी हुई है, और अमेरिकी सैनिकों की गतिविधियाँ भी जारी हैं। हाल ही में अमेरिका ने इराक से अपने सभी सैनिकों को वापस बुलाने का निर्णय लिया है, जो 30 सितंबर 2026 तक पूरा होगा। अफगानिस्तान से वापसी के बाद, इराक से सैनिकों की विदाई वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखी जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने इराक के प्रधानमंत्री के साथ मिलकर यह घोषणा की कि अब अमेरिका और इराक के संबंध सैन्य सहयोग के बजाय व्यापार और आर्थिक सहयोग पर आधारित होंगे। हालांकि, वास्तविकता कुछ और ही बयां करती है।
अमेरिका की सैन्य उपस्थिति
जबकि अमेरिका इराक से निकलने की बात कर रहा है, उसने हाल के महीनों में मिडिल ईस्ट में लगभग 10,000 अतिरिक्त सैनिक तैनात किए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, पश्चिम एशिया में 500 से अधिक अमेरिकी सैनिक सक्रिय हैं। कुवैत में अमेरिका का सबसे बड़ा लॉजिस्टिक सेंटर है, जहां 13,500 सैनिक तैनात हैं। कतर के अल उदिद एयरबेस पर 11,000 सैनिक और 100 से अधिक लड़ाकू विमान मौजूद हैं। बहरीन में अमेरिकी नौसेना की फिफ्थ फ्लिट का मुख्यालय है, जिसमें 9,000 से अधिक नौसैनिक तैनात हैं। जॉर्डन, यूएई, सऊदी अरब और सीरिया में भी हजारों अमेरिकी सैनिक सक्रिय हैं। ऐसे में यह सवाल उठता है कि अगर अमेरिका मिडिल ईस्ट छोड़ रहा है, तो इतनी बड़ी सैन्य उपस्थिति क्यों बनाए रखी जा रही है?
नई रणनीति और इराक की स्थिति
अफगानिस्तान और इराक में दो दशकों तक चले अभियानों ने अमेरिका को भारी नुकसान पहुँचाया है। अब वाशिंगटन कम सैनिकों के साथ, अधिक तकनीक और तेज सैन्य प्रतिक्रिया की रणनीति पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इस नई नीति के तहत, अमेरिका स्थायी रूप से बड़ी संख्या में सैनिकों को रखने के बजाय कतर, कुवैत और बहरीन जैसे सुरक्षित ठिकानों का उपयोग करेगा। एयरक्राफ्ट कैरियर, ड्रोन, लंबी दूरी की मिसाइलें और खुफिया नेटवर्क के माध्यम से पूरे क्षेत्र पर नजर रखी जाएगी। इराक से सैनिकों की वापसी के पीछे कई कारण हैं, जिसमें इराकी संसद और जनता की विदेशी सैनिकों की वापसी की मांग शामिल है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ता तनाव
इस घटनाक्रम के बीच, मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ है, बल्कि कई मोर्चों पर बढ़ता दिखाई दे रहा है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम, इजराइल के साथ उसका टकराव, और सीरिया की अस्थिरता अमेरिका की प्राथमिकता बनी हुई है। दूसरी ओर, चीन भी इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर रहा है। ऐसे में अमेरिका किसी भी कीमत पर पश्चिम एशिया को पूरी तरह छोड़ने का जोखिम नहीं उठाना चाहता।