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मिडिल ईस्ट में तनाव: भारत की ऊर्जा नीति पर अमेरिका का प्रभाव

मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के चलते वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ी है। अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने पर अपनी राय रखी है, जिससे राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुसार निर्णय लेता है और सस्ते विकल्पों से कच्चा तेल खरीदता है। जानें भारत की ऊर्जा सुरक्षा की स्थिति और रूस से तेल खरीद पर सरकार का दृष्टिकोण।
 

वैश्विक तेल बाजार में अनिश्चितता

मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव के कारण वैश्विक तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जो कि विश्व के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में से एक है, के आसपास की स्थिति बेहद संवेदनशील हो गई है। अमेरिका और इजरायल की सैन्य गतिविधियों के चलते खाड़ी क्षेत्र में हालात और भी गंभीर हो गए हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेल की आपूर्ति और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ी है।


भारत का स्पष्ट रुख

इस बीच, अमेरिका ने भारत से रूस से तेल खरीदने के संबंध में अपनी राय रखी है, जिससे राजनीतिक और रणनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं। केंद्र सरकार ने शनिवार को स्पष्ट किया कि भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेता है और सस्ते व बेहतर विकल्पों से कच्चा तेल खरीदता है।


सरकार के बयान में कहा गया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव के बावजूद भारत की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित और स्थिर है। पिछले कुछ वर्षों में, भारत ने अपने कच्चे तेल के स्रोतों को बढ़ाया है, और अब यह लगभग 40 देशों से तेल आयात कर रहा है, जबकि पहले यह संख्या 27 थी। इससे आपूर्ति के वैकल्पिक मार्गों की उपलब्धता बढ़ी है।


रूस से तेल खरीद पर भारत का दृष्टिकोण

भारत ने यह भी पुष्टि की है कि वह अमेरिकी अस्थायी छूट के बाद रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखेगा। यह छूट मिडिल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष के कारण दी गई थी। केंद्र ने स्पष्ट किया कि भारत अपने ऊर्जा हितों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है और किसी अन्य देश की अनुमति पर निर्भर नहीं है।


सरकार के अनुसार, भारत पहले भी रूस से तेल खरीदता रहा है और फरवरी 2026 में भी रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चे तेल का आपूर्तिकर्ता बना रहेगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद भी भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों की आपत्तियों के बावजूद रूस से तेल आयात जारी रखा।


ऊर्जा सुरक्षा की स्थिति

ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सरकार ने बताया कि देश में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों का पर्याप्त भंडार है। भारत के पास लगभग 250 मिलियन बैरल का रिजर्व है, जो लगभग सात से आठ सप्ताह की खपत के बराबर है। इसके अलावा, भारत की कुल रिफाइनिंग क्षमता लगभग 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रति वर्ष है, जो घरेलू जरूरतों से अधिक है।


विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी और इजरायली सैन्य कार्रवाई और तेहरान की जवाबी गतिविधियों के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार मार्गों पर प्रभाव पड़ा है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में वृद्धि हो रही है और कई देशों में ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।