मोहन भागवत के बयान पर उठे सवाल: क्या हिन्दू शब्द का सही अर्थ है?
मोहन भागवत का विवादास्पद बयान
मोहन भागवत के हालिया बयानों पर मौलाना मदनी और ओवैसी ने शायद हंसी उड़ाई होगी। वहीं, कुछ जानकार हिन्दू इस पर सिर धुनते होंगे — यह कितना अजीब है। संघ के नेता अपने शब्दों की सच्चाई से भली-भांति परिचित हैं। अन्यथा, पिछले सौ वर्षों में संघ का कोई प्रमुख नेता भारतीय असदुद्दीन या शहाबुद्दीन नहीं बना। आर.एस.एस. के अनुसार, असदुद्दीन भी हिन्दू हैं और आर.एस.एस. हिन्दुओं का संगठन है। लेकिन, शहाबुद्दीन को कभी भी संघ का प्रमुख नहीं बनाया गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने हाल ही में कहा कि "भारत में कोई अहिन्दू नहीं है, क्योंकि सभी एक ही पूर्वजों के वंशज हैं", और देश की मूल संस्कृति हिन्दू है। उन्होंने यह भी कहा कि सभी मुसलमान और ईसाई भी एक ही पूर्वजों के वंशज हैं, लेकिन "उन्हें शायद यह पता नहीं है, या वे इसे भूल गए हैं"। भागवत ने यह भी दावा किया कि हिन्दू ही भारत के लिए 'उत्तरदायी' हैं। यह सब उन्होंने एक सार्वजनिक व्याख्यान में कहा।
इस बयान पर मौलाना मदनी और ओवैसी ने शायद हंसी उड़ाई होगी। वहीं, कुछ जानकार हिन्दू इस पर सिर धुनते होंगे — यह कितना अजीब है। एक तो इसलिए, पूरी मानव जाति ही वनमानुषों की वंशज हैं। तो इससे क्या साबित हुआ! दूसरे, 'हिन्दू' शब्द ही विदेशी, फारसी भाषा का है। किसी भारतीय ज्ञान या धर्म की पुस्तक में यह शब्द नहीं है। भारतीय शास्त्रों और लोक में राजा, जन, आर्य, और धर्म शब्द ही मिलते हैं। तब 'हिन्दू' किसे और क्यों कह रहे हैं? वह भी 'भारतीय ज्ञान' की बात करने वाले लोग?
अभी 'वन्दे मातरम्' की पूरी जयकार करने का आदेश दिया गया है। जिस गीत के रचयिता बंकिम चंद्र ने स्पष्ट कहा था कि 'हिन्दू' शब्द म्लेच्छों का दिया है, जिससे वे भारत के सनातन धर्मियों का उल्लेख करते हैं। तो, आर.एस.एस. नेता म्लेच्छों के दिए नाम का गुणगान कर रहे हैं। अपनी भाषा छोड़कर दूसरों की भाषा का अनुकरण कर रहे हैं।
वे राजधर्म की भारतीय धारणा को छोड़कर यूरोपीय पार्टीबाजी के सबसे घटिया रूप में डूबे हुए हैं। केवल प्रचार के लिए 'भारतीय ज्ञान' की बातें करना और तिलक, अंगवस्त्र का आडंबर करना। जबकि पार्टीबंदी भारतीय परंपरा में कभी नहीं रही है।
हमारे शास्त्र और लोक में केवल धर्म और अधर्म का भेद रहा है — देशी और विदेशी का नहीं। महाभारत युद्ध में कौरव और पांडव, दोनों पक्ष से विदेशी राजा भी लड़े थे। इसलिए 'देशद्रोह' शब्द भी भारतीय ज्ञान में नहीं है। यह भी यूरोपीय धारणा है, जो हाल की है। देशद्रोह तो 'नेशनलिज्म' की नई धारणा से जुड़ा है, जो चार सौ साल पहले यूरोप में भी नहीं थी।
यदि आर.एस.एस. नेता की बात करें, तो पाकिस्तान और बंगलादेश में भी सभी हिन्दू हैं। क्योंकि 1947 के राजनीतिक विभाजन के सिवा हजारों वर्षों से ये तीनों भू-भाग भारत ही हैं। पाकिस्तान (और बंगलादेश) की संस्कृति, भाषा, इतिहास, और जनता वही है — जो अस्सी साल पहले थी। तब संघ नेता का भारत तो वह भी है। अन्यथा, वे किस 'अखंड भारत' की बात करते रहे हैं?
दरअसल, संघ नेता अपने कथनों की सच्चाई से परिचित हैं। अन्यथा, पिछले सौ वर्षों में उनका कोई प्रमुख नेता भारतीय असदुद्दीन या शहाबुद्दीन नहीं बना। क्योंकि आर.एस.एस. के अनुसार असदुद्दीन भी हिन्दू हैं और आर.एस.एस. हिन्दुओं का संगठन है। लेकिन, शहाबुद्दीन को कभी भी संघ का प्रमुख नहीं बनाया गया।
ऐसा लगता है कि संघ नेता भी अपनी गलतियों को छिपाने के लिए गाँधीजी की रणनीति अपना रहे हैं। यह बनावट कि झूठी बात को बार-बार कहने से उनकी स्थिति सुरक्षित रहेगी। लोग सोचेंगे कि उन्होंने जानबूझकर गलत नहीं कहा, क्योंकि वे अब भी वही बात दोहरा रहे हैं।
इसलिए, मुहम्मद अफजल, दाऊद इब्राहीम, असदुद्दीन ओवैसी, परवेज मुशर्रफ, आदि तो हिन्दू ही हैं। इसलिए समस्या खत्म! क्योंकि तब तो आल इंडिया मुस्लिम लीग, ए.आई.एम.आई.एम., लश्करे तोयबा, इंडियन मुजाहिदीन, आदि सभी हिन्दू संगठन हैं।
इसलिए, कश्मीर से हिन्दुओं का सफाया नहीं हुआ — यह सब झूठ है। वहाँ कुछ हिन्दुओं ने दूसरे हिन्दुओं को मार भगाया, बस। जैसे, हिन्दू परिवारों में एक भाई दूसरे भाई का हिस्सा मारकर उसे भगा देता है। इतना ही कश्मीर में हुआ।
इसी क्रम में, भारत में मस्जिदें भी वास्तव में हिन्दू पूजा स्थल हैं। क्योंकि वहाँ तो हिन्दू ही जाते हैं। वहाँ हिन्दू ही नमाज पढ़ते हैं, जैसे दूसरे हिन्दू कहीं मंदिर में मंत्र पढ़ते हैं। आर.एस.एस. की शब्दावली में, यह केवल 'पूजा-विधि' का भेद है!
इसलिए, डफर तो डफर ही रहेंगे, बाकी अपना समझें। जैसा एक अन्य बड़े आर.एस.एस. नेता ने कहा था: 'हम ऐसे ही हैं और रहेंगे। यदि तुम्हें नापसंद है तो दूसरा संगठन बना लो!' उनकी यह ठसक वाजिब है।
यदि हिन्दू समाज एक ऐसा नेता पैदा नहीं कर सकता जो सच्चाई से आँख मिलाकर, विवेक के साथ, उपयुक्त राजनीति कर सके — तो वह समाज शून्य है! फिर, डफर को मनमानी करने, हाँकने, नित नए मनगढ़ंत बोलने, और दूसरों को दोष या उपदेश देकर अपनी हर मटियामेट से पल्ला झाड़ने से कौन रोक सकता है!
यह बयान इसलिए भी सिर धुनने को विवश करता है, क्योंकि वही संघ नेता हर कठिन मौके पर यह भी कहते हैं कि 'हमने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा'। यानी, जब फायदा लेना हो तो हिन्दुओं पर अपने संगठन का एकाधिकार दिखाना, और अन्य सभी दलों को मुस्लिम-परस्त कहना। लेकिन जब हिन्दुओं पर चोट पड़े और मुश्किल बन आए, तो अपने को 'राष्ट्रीय' बताकर हिन्दू हितों से पल्ला झाड़ लेना कि 'दूसरे क्या कर रहे हैं! क्या हमीं ने ठेका ले रखा है?'
इसलिए, जैसे भी देखें, ऐसे वक्तव्य शुद्ध आत्म-प्रवंचना हैं। हिन्दू नेता इस के पुराने रोगी रहे हैं। उनके अनुयायी भी वैसे ही होते हैं जो शर्म की बात पर ताली पीटते हैं। मानो, मुसलमानों को भी 'हिन्दू' कहकर उन्होंने कोई किला फतह कर लिया हो! ऐसी विचित्रता उनके बयानों में अपवाद नहीं, बल्कि नियम से मिलती हैं।
वास्तव में, आत्म-प्रवंचना हिन्दू नेतृत्व की आम बीमारी रही है। अपने को हर विषय का ज्ञाता मानना इसका एक मुख्य तत्व है। बहुत बोलना, नियमित उपदेश देना, और आत्म-प्रशंसा भी। साथ ही, अपने पिछले दावों या करनी की समीक्षा नहीं करना। यानी, अनुभव से कुछ न सीखना। अंततः, इतिहास से अनजान रहते हुए भी सब को हाँकने की जिद दिखाना।
यह पाँचों तत्व उक्त बयान में भी हैं। यह सब कोई नई बात नहीं है। गाँधीजी से लेकर आज तक अनेक हिन्दू नेताओं में वह दुःखद प्रवृत्ति देखी जा सकती है। अतः यह आधुनिक हिन्दू बीमारी है। अहंकारी, विद्वेषी, अज्ञानी, 'राष्ट्रवादी' हिन्दू की बीमारी। जिसे सत्य, ज्ञान, विवेक, शास्त्र, मनीषा — किसी से प्रथम लगाव नहीं। उसके बदले उसे आत्म-प्रवंचना, सुविधाजनक कल्पनाएं, मीठा झूठ, प्रचार, और आत्म-श्लाघा अधिक प्रिय है।
उनके बयान की असलियत दिखाए जाने पर, कभी वे इसे अपनी 'चतुराई' या 'युगधर्म' या 'लाचारी', आदि कहकर सही ठहराते हैं। यानी, उसे अनुचित, त्याज्य फिर भी नहीं मानते! इस प्रकार, यह एक सुविधाभोगी, कष्ट और जवाबदेही से भागने वाली, आरामपसंद राजनीति करने वाली सुखानुभूति में रहने की बीमारी है। डोपामिन जैसी। सौ साल पहले 'राष्ट्रवादी' भावना के बढ़ने के साथ यह बीमारी बढ़ती गई है। हाल के वर्षों में नेताओं ने अपने स्वार्थ में इसे और बढ़ाया है।
यह भाषा और शब्दों को विकृत करना है। जो सांस्कृतिक पतन का ही लक्षण है। राजनीतिक प्रचारक पहले भी ऐसा करते रहे हैं। जिस किसी नेता को 'महान', 'दार्शनिक', 'ऋषि', आदि कहना। पर आर.एस.एस. संप्रदाय ने इसे सनक का रूप दे दिया है। आए दिन संशोधित, विकृत होने वाले राजनीतिक संविधान को 'धर्मग्रंथ' कहना, किसी सरकारी ऑफिस को 'तीर्थ' कहना, मामूली सड़कों को 'ज्ञान', 'कर्तव्य', आदि संज्ञा देना उसके नमूने हैं। यह सब भाषा को तहस-नहस करना है.
यदि सशस्त्र सुरक्षाकर्मियों से घेरे में रहने वाला सरकारी ऑफिस 'तीर्थ' है, तो बद्री-केदार क्या हैं? शायद टूरिस्ट प्लेस! जहाँ उसी ऑफिस ने 'सेल्फी प्वाइंट' बनवा दिए हैं। मानो वहाँ आध्यात्मिक अनुभूति नहीं, मजे और टूर करने जाना हो। यह सब पवित्र शब्दों, स्थानों को राजनीतिक स्वार्थ में विकृत करने का पाप है।
जरा सोचें — हमारी भाषा और पवित्र स्थानों के साथ ऐसा अनाचार अंग्रेजों ने कभी किया था? उत्तर मिलेगा: उन अंग्रेज खोजियों और शासकों ने ही भारतीय इतिहास की विस्मृत सभ्यता, संस्कृति, धर्म, और ज्ञान के एक से एक स्थानों, अवशेषों और प्रतीकों को प्रेम व श्रद्धा से विश्व के समक्ष अमूल्य धरोहर बना कर पुनः प्रस्तुत किया। वह भी ऐसी शुद्ध निष्ठा से कि कहीं, किसी महान धरोहर या अद्भुत नवनिर्माण के पास भी, उन्होंने अपने नाम की पट्टी तक नहीं लगाई। भारत में वैसे सैकड़ों स्थान आज भी इस की गवाही देते हैं कि उसे बनवाने या खोजने वाले किसी अंग्रेज वायसराय या गवर्नर, विद्वान, पुरातत्वविद, आदि का स्मारक, आदि कुछ भी वहाँ नहीं जोड़ा गया था.
इसकी तुलना करें: देसी नेताओं की सनक से जो हर मामूली निर्माण, बिल्डिंग, सड़क, पुल, आदि ही नहीं, किसी मंदिर के बनने पर भी अपने नाम की शिला लगाते रहते हैं। देवता से ज्यादा अपने पर कैमरा चमकाते हैं। खेल स्टेडियम हो या विश्वविद्यालय — हर कहीं नेता नाम चिपकाते हैं.
यह सब अपवाद स्वरूप नहीं हो रहा। हमारे नेता नियमित रूप से विचित्र बातें बोलते और अजीब काम करते रहते हैं.