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युवाओं की शक्ति: कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला और दमन की नीति पर सवाल

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने युवाओं के अधिकारों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, जिससे दमन की नीति पर सवाल उठ रहे हैं। कॉकरोच आंदोलन के तहत युवाओं की लामबंदी ने सत्ता प्रतिष्ठान को झकझोर दिया है। 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल युवाओं के खिलाफ मुकदमे वापस लेने की मांग को लेकर 5 सितंबर को फिर से मार्च का आयोजन किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। यह घटनाक्रम युवाओं की शक्ति का प्रतीक है और दमन की नीति के उलटे परिणामों को दर्शाता है।
 

युवाओं की लामबंदी का असर


सत्ता के उच्च स्तरों तक यह संदेश पहुंच चुका है कि दमन की नीति उलटा असर डाल सकती है। इसीलिए अब युवाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जा रही है, जो कि एक सकारात्मक कदम है।


कॉकरोच आंदोलन के तहत युवाओं की एकजुटता का प्रभाव सत्ता प्रतिष्ठान पर स्पष्ट रूप से देखा गया। 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल युवाओं के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस लेने की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने 5 सितंबर को दिल्ली में फिर से मार्च करने का ऐलान किया है। दिल्ली पुलिस ने इस कार्यक्रम को अनुमति देने में कठिनाई का संकेत दिया, यह कहते हुए कि ब्रिक्स+ शिखर सम्मेलन की तैयारियों के कारण ऐसा करना मुश्किल होगा। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई कि इस आंदोलन से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न हो सकती है, इसलिए इसे रोका जाए।


हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने इस याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वर्तमान में यह मानने का कोई ठोस आधार नहीं है कि युवाओं का मार्च कानून-व्यवस्था को प्रभावित करेगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है और उसे विश्वास है कि सरकार इस कार्य को कानून के दायरे में रहकर करेगी। हाल के समय में जनतांत्रिक अधिकारों के पक्ष में कोर्ट का यह स्पष्ट रुख कम ही देखने को मिला है।


इस घटनाक्रम के बाद, दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें अनुरोध किया गया कि अनुच्छेद 142 के तहत संविधान से मिले विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए कॉकरोच आंदोलन के दौरान दर्ज सभी प्राथमिकियों को रद्द किया जाए।


कोर्ट ने इस याचिका पर सकारात्मक रुख दिखाया। यह घटनाक्रम युवाओं की उभरी शक्ति का प्रतीक है। पिछले कुछ महीनों में छात्रों और युवाओं का असंतोष सड़कों पर जिस तरह से प्रकट हुआ है, उसने यह धारणा तोड़ दी है कि सरकारी मशीनरी के अत्यधिक उपयोग से असहमति और प्रतिरोध को हमेशा के लिए दबाया जा सकता है। सत्ता के उच्च स्तरों तक यह संदेश पहुंचा है कि दमन की नीति का उलटा परिणाम हो सकता है। इसलिए अब युवाओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जा रही है, जो कि स्वागतयोग्य है।