युवाओं के दबाव में सरकारें: लोकतंत्र में सकारात्मक बदलाव
संस्थाओं की जवाबदेही और जन भावना
लोकतंत्र में संस्थाओं का जवाबदेह होना और जन भावना के अनुरूप कार्य करना एक सकारात्मक संकेत है। हालांकि, कई बार जन भावना को संतुष्ट करना संविधान और कानून के दायरे में नहीं होता। फिर भी, लोकतंत्र में जनता की शक्ति सर्वोपरि होती है और सभी संस्थाएं सिद्धांत रूप से जनता के हित में कार्य करती हैं। हाल के दिनों में, संसद, सरकार और न्यायालयों जैसी संस्थाएं जन भावना को समझते हुए निर्णय ले रही हैं। यह एक सकारात्मक संकेत है। यदि हम गहराई में जाएं, तो यह स्पष्ट होता है कि जन भावना मुख्यतः युवाओं की है, जिसने सरकार और अन्य संस्थाओं को प्रभावित किया है। यह एक महत्वपूर्ण घटना है कि देश की संस्थाएं युवाओं की आवाज़ को सुन रही हैं।
प्रदर्शन और सरकार की प्रतिक्रिया
यह याद करने योग्य है कि पहले कभी ऐसा नहीं हुआ कि कोई संगठन अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन की अनुमति मांगे और सरकार प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही उनकी मांग मान ले। आमतौर पर, सरकारें प्रदर्शन के डर से मांगें मानती हैं, लेकिन इतनी जल्दी नहीं। जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन ने सरकार को चिंतित कर दिया है। नई पीढ़ी के युवाओं ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी प्रकार के समझौते को स्वीकार नहीं करेंगे। उनकी मांगें उनकी शर्तों पर पूरी की जानी चाहिए। सरकार को इस बात को स्वीकार करने में समय लगा, जिसके कारण जंतर मंतर पर 35 दिन का आंदोलन हुआ। लेकिन इसके बाद, केवल घोषणा करने से ही काम हो गया।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी के पांच सितंबर को होने वाले मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया, जो एक सकारात्मक उदाहरण है। जब युवाओं ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए मार्च का ऐलान किया, तो एक व्यक्ति ने यह कहते हुए कोर्ट में याचिका दायर की कि 12 और 13 सितंबर को दिल्ली में ब्रिक्स का सम्मेलन है, इसलिए प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया। इसके तुरंत बाद, दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सभी एफआईआर रद्द करने का आदेश देने का आग्रह किया। यह वही मांग थी जो कॉकरोच जनता पार्टी ने की थी।
न्यायपालिका का युवाओं के प्रति दृष्टिकोण
यह भी उल्लेखनीय है कि न्यायपालिका युवाओं की भावना का सम्मान कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने कॉकरोच जनता पार्टी के मार्च को रोकने से मना कर दिया और सभी एफआईआर रद्द करने का आदेश दिया। इसके अलावा, बार कौंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा को कार्यकाल कम करने का निर्देश दिया गया। यह कदम हैदराबाद की लॉ यूनिवर्सिटी के छात्रों के विरोध के बाद उठाया गया।
सरकारों का झुकाव
देश के विभिन्न हिस्सों में सरकारों का झुकाव देखने को मिल रहा है। दिल्ली में राहुल गांधी ने धरने पर बैठकर साहिल लोचब की ओर से एफआईआर दर्ज कराने में सफलता पाई। इससे पहले पुलिस एफआईआर दर्ज करने को तैयार नहीं थी। इसी तरह, कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने एक राइटविंग कार्यकर्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। यह दर्शाता है कि संस्थाएं जन दबाव के आगे झुक रही हैं।
राजस्थान और गोवा की मिसालें
राजस्थान में भजनलाल सरकार ने स्कूलों के कायाकल्प के लिए 1250 करोड़ रुपए का फंड बनाया है। पहले कॉकरोच जनता पार्टी के सदस्यों ने स्कूलों की स्थिति को उजागर किया, जिसके बाद सरकार ने झुकने का निर्णय लिया। इसी तरह, गोवा की सरकार ने धर्मांतरण कानून को टाल दिया है। यह सब चुनावी चिंताओं के कारण हो रहा है।