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रंगभरी एकादशी: काशी में महादेव का श्रृंगार और होली का उत्सव

रंगभरी एकादशी के अवसर पर महादेव अपने वैरागी रूप में मणिकर्णिका महाश्मशान में भस्म की होली खेलते हैं। इस दिन काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष श्रृंगार और पूजा की जाती है। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक है। जानें इस दिन का धार्मिक महत्व और काशी की सांस्कृतिक पहचान के बारे में।
 

महादेव का वैरागी रूप और होली का उत्सव

रंगभरी एकादशी के बाद महादेव अपने वैरागी स्वरूप में मणिकर्णिका महाश्मशान में भस्म की होली का आनंद लेते हैं। यह उनके गृहस्थ और औघड़ रूपों के बीच संतुलन को दर्शाता है। मान्यता है कि रंगभरी के उत्सव में देवताओं ने भाग लिया, लेकिन भूत-प्रेत और अघोरी शामिल नहीं हुए। इसलिए महादेव ने अगले दिन मसान में उनके साथ होली खेलने का निर्णय लिया।


काशी विश्वनाथ श्रृंगार दिवस

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को काशी विश्वनाथ मंदिर में विशेष श्रृंगार और पूजा की परंपरा है। इसे रंगभरी एकादशी या आमलकी एकादशी भी कहा जाता है। इस दिन का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व अत्यधिक है। इस वर्ष, फाल्गुन शुक्ल एकादशी 27 फरवरी 2026 को रात 12:33 बजे शुरू होगी और उसी दिन रात 10:32 बजे समाप्त होगी। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार किया जाएगा। मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव माता पार्वती का गौना कराकर पहली बार काशी आए थे।


महादेव और माता पार्वती का पुनर्मिलन

रंगभरी एकादशी की कथा भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन से जुड़ी है। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के दिन उनका विवाह हुआ था। विवाह के बाद माता पार्वती कुछ समय अपने पिता हिमालय में रहीं। फाल्गुन शुक्ल एकादशी के दिन महादेव उन्हें विदा कराकर पहली बार अपनी प्रिय नगरी काशी लेकर आए।


काशी की सांस्कृतिक पहचान

महादेव का जामाता के रूप में काशी लौटना केवल एक कथा नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। इस दिन पूरा शहर उल्लास से भर जाता है। कहा जाता है कि काशी में श्रृंगार दिवस का विशेष स्थान है। यह वह दिन है जब वैरागी शिव गृहस्थ रूप में प्रकट होते हैं।


भव्य श्रृंगार और होली का आरंभ

जब बाबा विश्वनाथ माता पार्वती के साथ काशी में प्रवेश करते हैं, तो पूरा शहर उनके स्वागत में उमड़ पड़ता है। भक्त और देवता उन पर अबीर-गुलाल उड़ाते हैं। इस दिन महादेव का राजसी श्रृंगार किया जाता है। पारंपरिक पालकी यात्रा इस दिन का मुख्य आकर्षण होती है।


मसान की होली और जीवन का संदेश

रंगभरी एकादशी के अगले दिन महादेव मणिकर्णिका महाश्मशान में भस्म की होली खेलते हैं। यह जीवन और मृत्यु के बीच संतुलन को दर्शाता है। काशी की परंपरा यही कहती है कि जीवन और मृत्यु दोनों शिव में समाहित हैं। वर्ष 2026 में मसान की होली 28 फरवरी को मनाई जाएगी।