राज्यसभा में उम्मीदवारों का चयन: भाजपा की रणनीति और सामाजिक समीकरण
भाजपा के उम्मीदवारों की घोषणा
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश की आठ राज्यसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा की है। इस निर्णय पर चर्चा हो रही है कि भाजपा ने किस प्रकार से चुनावी सामाजिक समीकरण को संतुलित किया है। बताया जा रहा है कि इनमें से तीन उम्मीदवार पिछड़ी जातियों से, दो दलित समुदाय से, दो ब्राह्मणों से और एक ठाकुर समाज से हैं।
राज्यसभा की योग्यता और उम्र सीमा
हालांकि, यह बताने की आवश्यकता नहीं समझी गई कि इन उम्मीदवारों की अन्य योग्यता क्या है। संविधान के अनुच्छेद 80 के अनुसार, राज्यसभा के सदस्यों के लिए उम्र की न्यूनतम सीमा 30 वर्ष है, जबकि लोकसभा के लिए यह 25 वर्ष है।
उम्र की यह सीमा इस उद्देश्य से निर्धारित की गई थी कि राज्यसभा में जाने वाले सदस्य अधिक परिपक्व और अनुभवी हों। यह माना गया कि ऐसे सदस्य जो लोकसभा का चुनाव नहीं जीत सकते, उन्हें राज्यसभा के माध्यम से संसद में भेजा जाए।
मनोनयन की प्रक्रिया
अनुच्छेद 80 में 12 सदस्यों के मनोनयन की व्यवस्था भी है, जिन्हें राष्ट्रपति सरकार की सलाह पर नियुक्त करते हैं। ये सदस्य साहित्य, कला, संस्कृति और समाज सेवा में विशिष्ट योगदान देने वाले होते हैं।
हालांकि, चुनाव के माध्यम से आने वाले सदस्यों के लिए कोई विशेष योग्यता निर्धारित नहीं की गई है, लेकिन यह माना जाता है कि वे अन्य नेताओं की तुलना में कुछ विशेष योग्यता रखते हैं।
राज्यसभा की भूमिका और चुनौतियाँ
हाल के समय में यह देखा गया है कि भाजपा ने राज्यसभा को एक ऐसा मंच बना दिया है, जहां किसी को भी सदस्य बनाया जा सकता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, इससे राज्यसभा की भूमिका और संसदीय कार्यप्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
राज्यसभा में कई सदस्य ऐसे होते हैं, जिनका विधायी कार्य में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं होता। उनका मुख्य कार्य सरकार के प्रस्तावों का समर्थन करना और प्रधानमंत्री का स्वागत करना रह गया है।
पद्म पुरस्कारों का लोकतंत्रीकरण
प्रधानमंत्री मोदी ने पद्म पुरस्कारों को लोकतांत्रिक बनाने की पहल की थी, जिससे दूरदराज के लोगों को भी पहचान मिली। लेकिन इसी तरह की पहल राज्यसभा को उसके मूल उद्देश्यों से दूर ले जा रही है।
राज्यसभा को लोकसभा की मनमानियों पर चेक एंड बैलेंस की भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन यह भूमिका कम होती जा रही है।
भाजपा और सपा की रणनीतियाँ
भाजपा ने अपने उम्मीदवारों के माध्यम से सामाजिक समीकरण साधा है, जबकि सपा ने अपने उम्मीदवारों के चयन में परिवार और धन को प्राथमिकता दी है।
हर दोवार्षिक चुनाव के बाद राज्यसभा की गुणवत्ता में कमी आती जा रही है।