राहुल गांधी का ममता बनर्जी पर नया दृष्टिकोण: चुनावी नतीजों का विश्लेषण
राहुल गांधी का ममता बनर्जी पर बयान
राहुल गांधी के उदार मिजाज की चर्चा हो रही है। पश्चिम बंगाल के चुनावों में उन्होंने ममता बनर्जी के पिछले पांच वर्षों के शासन को पूरी तरह से विफल बताया, यह कहते हुए कि कानून-व्यवस्था की स्थिति अत्यंत खराब हो गई थी। उनका मानना है कि इसी कारण भाजपा को राज्य में अपनी जड़ें मजबूत करने का अवसर मिला। लेकिन जब तृणमूल कांग्रेस चुनाव में हार गई और ममता को भी पराजय का सामना करना पड़ा, तो राहुल ने उनके समर्थन में खड़े होकर कहा कि बंगाल के चुनाव परिणाम निर्वाचन आयोग की मिलीभगत से भाजपा की लूट का उदाहरण हैं। उनका कहना है कि यह मुद्दा किसी एक राजनीतिक दल या नेता की हार का नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र को एक जाल में फंसाने का मामला है।
राहुल की दुविधा
राहुल की दोनों बातें सही हैं। ममता का शासन पिछले पांच वर्षों में सुशासन से कुशासन में बदल गया। भाजपा ने बंगाल में जो राजनीतिक जमीन हासिल की, वह ममता की मदद से ही संभव हुआ। राहुल का यह भी कहना है कि जो परिणाम जनादेश के रूप में प्रस्तुत किए जा रहे हैं, वे वास्तव में एक छल और धन के बल पर हासिल किए गए हैं। बंगाल में जो कुछ हुआ, वह निर्वाचन आयोग की विश्वसनीयता पर एक बड़ा धब्बा है।
ममता बनर्जी का इतिहास
राहुल को ममता की बेदखली के तरीकों से चिंतित होना चाहिए। उनका यह चिंतन भावनात्मक नहीं, बल्कि व्यावहारिक है। ममता का कांग्रेस के प्रति रवैया ऐसा नहीं रहा है कि कोई उनके प्रति सहानुभूति रखे। ममता अगर अपनी गलतियों के लिए माफी मांगने की कोशिश भी करें, तो भी विपक्ष उनकी खामियों को नहीं भूल सकता। भाजपा ने ममता को बाहर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन आज जो स्थिति है, वह उनके अपने कार्यों का परिणाम है।
कांग्रेस में ममता का सफर
करीब तीन दशक पहले ममता कांग्रेस में थीं और उन्होंने वाम दलों के खिलाफ लड़ाई के लिए कांग्रेस से सहयोग की मांग की थी। लेकिन जब कांग्रेस ने उनके सुझावों को नजरअंदाज किया, तो उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। 1998 में जब भाजपा की सरकार बनी, तो ममता ने अपनी पार्टी को भाजपा के साथ जोड़ लिया और रेल मंत्री बनीं।
भाजपा के साथ ममता का संबंध
ममता ने कई बार भाजपा के साथ अपने संबंधों को मजबूत किया, लेकिन जब रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया, तो उन्होंने भाजपा से दूरी बना ली। हालांकि, उन्होंने कभी भी भाजपा के खिलाफ खुलकर बात नहीं की। ममता की राजनीति में कई उतार-चढ़ाव आए हैं, लेकिन उनका भाजपा के साथ संबंध हमेशा जटिल रहा है।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य
हाल के वर्षों में ममता ने कई बार भाजपा के खिलाफ आंदोलन किए, लेकिन जब संसद में सीएए पर मतदान हुआ, तो तृणमूल कांग्रेस के सांसद अनुपस्थित रहे। यह सवाल उठता है कि ऐसा क्यों हुआ। ममता के करीबी सहयोगी मुकुल राय ने भाजपा में शामिल होकर पार्टी को छोड़ दिया, लेकिन बाद में वापस लौट आए। यह सब घटनाएं ममता की राजनीतिक स्थिति को और जटिल बनाती हैं।
ममता का विपक्ष के प्रति रवैया
ममता ने कभी भी विपक्ष के साथ पूरी तरह से सहयोग नहीं किया। उन्होंने कांग्रेस की संभावनाओं को कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। राहुल गांधी की 'भारत जोड़ो यात्रा' का ममता ने मजाक उड़ाया, फिर भी राहुल का उनके प्रति हालिया स्नेह क्या दर्शाता है?