राहुल गांधी की छात्र आंदोलन में देरी: कांग्रेस की विश्वसनीयता पर सवाल
कांग्रेस की देरी से उठे सवाल
कांग्रेस ने छात्रों के मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया में काफी देर कर दी। यदि राहुल गांधी ने 17 जून को कोटा यात्रा के बाद इस मुद्दे को उठाया होता, तो उनकी साख पर सवाल नहीं उठता। हालांकि, जून में भी कांग्रेस ने प्रदर्शन शुरू करने में काफी समय लिया। नीट यूजी परीक्षा 3 मई को हुई थी और पेपर लीक की खबर 7 मई को आई थी।
यह दूसरी बार था जब एक साल के भीतर नीट यूजी परीक्षा का पेपर लीक हुआ। पहले भी 2024 की परीक्षा में पेपर लीक और परीक्षा केंद्रों की समस्याएं सामने आई थीं। उस समय पूरी परीक्षा रद्द नहीं हुई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और कई केंद्रों पर दोबारा परीक्षा आयोजित की गई। 2024 में 24 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी।
एक बार फिर नीट यूजी परीक्षा के पेपर लीक के बाद छात्रों का आक्रोश स्वाभाविक था। पिछले 10 वर्षों में 150 से अधिक परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं, जिनमें कई ऐसी परीक्षाएं शामिल हैं जिनमें एक लाख से अधिक छात्र शामिल हुए थे। मई के पहले सप्ताह में पेपर लीक की खबर आने के बाद कांग्रेस को तुरंत इस मुद्दे को उठाना चाहिए था। लेकिन कांग्रेस ने इसे सोशल मीडिया पर ही सीमित रखा। जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की टिप्पणी के आधार पर कॉकरोच जनता पार्टी ने 6 जून को प्रदर्शन का ऐलान किया, तब कांग्रेस ने भी अपना कार्यक्रम घोषित किया।
कांग्रेस ने तय किया कि राहुल गांधी 17 जून को कोटा जाएंगे, इसके बाद 23 दिन का लंबा गैप होगा। फिर वे 10 जुलाई को प्रयागराज और 11 जुलाई को पटना में छात्रों से संवाद करेंगे। यह गैप राहुल गांधी की गंभीरता की कमी को दर्शाता है। बताया जा रहा है कि उनका 20 दिन से अधिक का विदेश दौरा था।
इस समय नीट यूजी के 23 लाख छात्र और सीबीएसई के 10वीं के लगभग 18 लाख छात्र अपनी समस्याओं से जूझ रहे थे। सीबीएसई की ऑनस्क्रीन मार्किंग व्यवस्था ने छात्रों को बहुत परेशान किया। लेकिन राहुल गांधी ने इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनाया और पहले से तय कार्यक्रम के अनुसार विदेश चले गए। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या राहुल गांधी छात्रों के मुद्दों को गंभीरता से लेंगे?
राहुल गांधी का 21 जून को प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन परफॉर्मेटिव राजनीति का एक उदाहरण था, लेकिन इसके पीछे नैतिक बल की कमी थी। उनके प्रदर्शन में कांग्रेस के लोग जुटे थे, लेकिन यह भीड़ स्वाभाविक नहीं थी। छात्रों पर लाठीचार्ज के मुद्दे को उठाते हुए, राहुल गांधी और अन्य विपक्षी सांसद 22 जुलाई को संसद में काले कपड़े पहनकर पहुंचे। लेकिन जब छात्र अपनी समस्याओं का सामना कर रहे थे, तब कांग्रेस वहां मौजूद नहीं थी।
कांग्रेस के लिए एक और समस्या यह है कि उनके शासन में भी प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक होते थे। राजस्थान में 2018 से 2023 के बीच 19 बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए थे। कांग्रेस ने भी किसी की जिम्मेदारी तय नहीं की थी। इसलिए, राहुल गांधी और कांग्रेस के सामने विश्वसनीयता का संकट है। यह संकट केवल निरंतरता और प्रतिबद्धता से ही दूर हो सकता है।
राहुल गांधी ने आंदोलन में भाग लेने का निर्णय तब लिया जब उनका विदेश दौरा समाप्त हो गया और संसद का सत्र शुरू हो गया। इससे पहले ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस ने मान लिया था कि इस मामले में अब कोई दम नहीं है। कांग्रेस के लोग कहेंगे कि राहुल गांधी छात्रों की गूंज कार्यक्रम में हिस्सा लेने देहरादून गए थे, लेकिन इसमें चुनाव की तैयारियों की चिंता अधिक थी।
हालांकि, कॉकरोच जनता पार्टी भी बहुत प्रतिबद्ध संगठन नहीं है, लेकिन उनके पास सोनम वांगचुक का चेहरा है। वांगचुक की भूख हड़ताल ने छात्रों को प्रेरित किया। कांग्रेस इस तरह की प्रेरणा नहीं जगा पा रही है। उनका प्रदर्शन केवल राजनीतिक गतिविधि है, जिस पर छात्र और उनके अभिभावक भरोसा नहीं करेंगे। यदि कांग्रेस की सक्रियता छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक विमर्श में बदल देती है, तो इसका लाभ भाजपा को होगा।
इसलिए, बेहतर होता कि कांग्रेस सोनम वांगचुक के आंदोलन को मजबूत करती, बजाय इसके कि उसे हाईजैक करने की कोशिश करती। यदि छात्र और युवा एक बड़े मुद्दे पर एकजुट होते हैं, तो चुनावों में इसका लाभ कांग्रेस को ही मिलेगा।