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लोकसभा में एफसीआरए संशोधन विधेयक पर गरमागरम बहस

लोकसभा में एफसीआरए संशोधन विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। विपक्ष ने इसे अल्पसंख्यकों और एनजीओ के खिलाफ बताया, जबकि सरकार ने आरोपों को खारिज किया। विधेयक को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया है, जहां इसकी विस्तृत जांच की जाएगी। जानें इस विधेयक के प्रावधानों और विपक्ष की चिंताओं के बारे में।
 

नई दिल्ली में विधेयक पर हंगामा


नई दिल्ली: बुधवार को लोकसभा में एफसीआरए संशोधन विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस हुई। विपक्ष ने इसे अल्पसंख्यकों और गैर सरकारी संगठनों के खिलाफ बताया, जबकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया। इस हंगामे के बीच विधेयक को 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने का प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित किया गया।


विधेयक पर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री का प्रस्ताव

लोकसभा की कार्यवाही फिर से शुरू होने पर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने एफसीआरए में संशोधन से संबंधित विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति को भेजने का प्रस्ताव रखा। इस दौरान विपक्षी सांसदों ने लगातार विरोध किया, फिर भी प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हो गया। समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल होंगे। लोकसभा सदस्यों का नामांकन अध्यक्ष और राज्यसभा सदस्यों का चयन सभापति करेंगे। समिति को विधेयक के प्रावधानों की विस्तृत जांच करके 2026 के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट संसद में प्रस्तुत करनी होगी।


अखिलेश यादव और रिजिजू के बीच तीखी नोकझोंक

विधेयक पर समाजवादी पार्टी के सांसद अखिलेश यादव और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच सदन में तीखी बहस हुई। यादव ने आरोप लगाया कि विपक्ष इस विधेयक का विरोध कर रहा है और सरकार के प्रस्ताव अल्पसंख्यकों के हितों के खिलाफ हैं। रिजिजू ने जवाब में कहा कि विपक्ष विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं बता सकता जो किसी अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाता हो। उन्होंने कहा कि विदेशी धन के उपयोग के लिए देश में स्पष्ट कानूनी व्यवस्था आवश्यक है। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने भी विधेयक वापस लेने की मांग की।


सरकार का विदेशी चंदे पर नया प्रस्ताव

प्रस्तावित कानून में एफसीआरए, 2010 में संशोधन किया जाएगा। यह कानून एनजीओ, धार्मिक संस्थाओं, शैक्षणिक संगठनों, चैरिटेबल ट्रस्ट और अन्य संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे के उपयोग को नियंत्रित करता है। सरकार के अनुसार, 15 जुलाई 2026 तक देश में 14,449 एफसीआरए पंजीकरण सक्रिय थे, जबकि 22,498 पंजीकरण रद्द और 15,212 की अवधि समाप्त हो चुकी थी। 2019 से 2022 के बीच पंजीकृत संस्थाओं को 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। नए प्रस्ताव में केंद्र द्वारा नियुक्त एक नामित प्राधिकरण बनाने की बात की गई है, जिसे पंजीकरण रद्द होने, वापस लेने या नवीनीकरण नहीं होने की स्थिति में विदेशी धन और उससे बनी संपत्तियों के प्रबंधन की शक्ति मिल सकती है।


राज्यों और अमेरिका से उठे सवाल

विधेयक पर केवल संसद में ही सवाल नहीं उठे हैं। नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा और मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के. संगमा ने भी इसके प्रावधानों पर चिंता जताते हुए विस्तृत जांच की आवश्यकता बताई है। सरकार का कहना है कि विधेयक को जेपीसी के पास भेजने से सभी पक्षों को अपनी आपत्तियां रखने और प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा करने का अवसर मिलेगा। दूसरी ओर, अमेरिकी सांसद रिले मूर ने भी प्रस्तावित बदलावों की आलोचना करते हुए इसे ईसाई संस्थाओं के खिलाफ बताया और भारत-अमेरिका संबंधों पर असर पड़ने की आशंका जताई। अब जेपीसी की जांच और रिपोर्ट से तय होगा कि विधेयक किस रूप में आगे बढ़ता है।