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विपक्षी गठबंधन की बैठक पर अनिश्चितता: ममता बनर्जी का बयान

विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' की बैठक की योजना पर अनिश्चितता छाई हुई है। ममता बनर्जी ने संकेत दिया है कि जून में बैठक हो सकती है, लेकिन चुनाव परिणामों ने सभी का उत्साह ठंडा कर दिया है। इस लेख में जानें कि कैसे चुनावी नतीजों ने विपक्ष की स्थिति को प्रभावित किया है और ममता बनर्जी की पार्टी के साथ कांग्रेस के संबंध कैसे बिगड़ गए हैं। क्या विपक्षी दल एकजुटता दिखा पाएंगे? जानने के लिए पढ़ें पूरा लेख।
 

विपक्षी गठबंधन की बैठक की योजना


इस महीने विपक्षी गठबंधन 'इंडिया' ब्लॉक की बैठक की योजना बनाई गई थी। अप्रैल में लोकसभा के विशेष सत्र के बाद यह तय हुआ था कि मई में पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों के बाद विपक्ष के नेता एकत्र होंगे। इस बैठक में सभी एक-दूसरे का आभार व्यक्त करने वाले थे। यह भी तय हुआ था कि नारी शक्ति वंदन कानून में संशोधन के लिए विपक्ष ने जिस एकता का प्रदर्शन किया था, वैसी ही एकता हमेशा दिखाई जाएगी। ममता बनर्जी के नेता भी इस पर सहमत थे। लेकिन चुनाव परिणामों के बाद सभी का उत्साह ठंडा पड़ गया है। मई का महीना समाप्त हो रहा है और बैठक की कोई जल्दी नहीं है। इस बीच, ममता बनर्जी ने संकेत दिया है कि विपक्षी गठबंधन के नेता जून में मीटिंग कर सकते हैं। हालांकि, यह एक प्रारंभिक बयान है और बैठक का स्थान, समन्वयक और एजेंडा अभी तय नहीं हुआ है।


चुनावी नतीजों का प्रभाव

अप्रैल में तृणमूल कांग्रेस के नेता पश्चिम बंगाल में जीत को लेकर आश्वस्त थे और उन्होंने कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी दलों की हर बात मान ली थी। उन्हें विश्वास था कि ममता बनर्जी की जीत के बाद दिल्ली में उनका भव्य स्वागत होगा। इसी विश्वास के चलते उन्होंने विपक्षी गठबंधन की मीटिंग पर सहमति दी थी। लेकिन चुनाव परिणाम पूरी तरह से विपरीत आए। न केवल ममता बनर्जी की पार्टी हार गई, बल्कि स्टालिन की पार्टी भी सत्ता से बाहर हो गई। बंगाल में भाजपा की जीत और तमिलनाडु में डीएमके की हार ने विपक्ष के लिए बड़ा झटका दिया।


चुनावी हार के कारणों में एक यह भी है कि कांग्रेस ने चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के खिलाफ अनाप शनाप बयान दिए। उन्होंने ममता पर भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगाया। वहीं, तमिलनाडु में चुनाव परिणामों के तुरंत बाद कांग्रेस ने डीएमके को छोड़कर टीवीके को समर्थन दिया, जो चौंकाने वाला था। कांग्रेस के केवल पांच विधायक जीते, लेकिन वह 60 साल बाद सरकार में शामिल हो गई। इसके बाद, डीएमके ने लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर सदन में अलग बैठने की व्यवस्था करने का अनुरोध किया। इस प्रकार, डीएमके और कांग्रेस के संबंध बिगड़ गए हैं। ममता बनर्जी के साथ भी कांग्रेस के संबंध अच्छे नहीं हैं।


विपक्ष की स्थिति

जब से ममता बनर्जी की पार्टी हार गई है, झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने विकल्पों पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं। महाराष्ट्र में शरद पवार अब खुलकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे हैं। यदि दोनों एनसीपी एकजुट होते हैं, तो उनका एनडीए के साथ रहना तय है। इस प्रकार, विपक्ष की अधिकांश पार्टियां अलग-अलग राजनीति कर रही हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि विपक्षी गठबंधन की कौन सी पार्टी या नेता एकजुटता दिखाने या बैठक करने में रुचि रखेगा। फिर भी, ममता बनर्जी ने कहा है कि जून में बैठक होगी, तो देखते हैं।