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संशोधित विदेश अंशदान विधेयक पर संयुक्त समिति का गठन

पार्लियामेंट में विवादास्पद विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की समीक्षा के लिए 31 सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन किया गया है। इस समिति में विभिन्न राजनीतिक दलों के सदस्य शामिल हैं। विधेयक का मुख्य उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों पर विदेशी फंडिंग की निगरानी को सख्त बनाना है। विपक्ष ने इस कानून को अल्पसंख्यकों पर प्रभाव डालने वाला बताया है, जबकि सरकार ने इसे पारदर्शिता के लिए आवश्यक बताया है। जानें इस विधेयक के पीछे की पूरी कहानी।
 

संयुक्त समिति का गठन


विवादास्पद विदेश अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 की समीक्षा के लिए संसद के दोनों सदनों की 31 सदस्यीय संयुक्त समिति का गठन किया गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने इस समिति का गठन किया है, जिसमें लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य शामिल हैं। भाजपा सांसद संजय जायसवाल को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। समिति में भाजपा के 14 और कांग्रेस के 5 सदस्यों के अलावा टीएमसी, डीएमके, सपा, जेडीयू और टीडीपी जैसे अन्य दलों के प्रतिनिधि भी शामिल हैं.


विधेयक का उद्देश्य

संसदीय समिति को शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किए गए इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और विदेशी फंडिंग पर सरकारी निगरानी को सख्त बनाना है। इसके अंतर्गत यदि किसी संगठन का एफसीआरए (FCRA) लाइसेंस रद्द होता है, तो उसकी संपत्तियों के प्रबंधन और निपटान के लिए एक नामित प्राधिकरण बनाने का प्रावधान है.


विपक्ष की चिंताओं पर सरकार की प्रतिक्रिया

विपक्ष के भारी विरोध के बाद 12 अगस्त को यह विधेयक संयुक्त समिति को भेजा गया था। विपक्ष और पूर्वोत्तर राज्यों (नागालैंड, मिजोरम और मेघालय) के मुख्यमंत्रियों ने चिंता व्यक्त की थी कि यह कानून अल्पसंख्यकों और ईसाई सामाजिक संस्थाओं को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह कानून किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि केवल विदेशी योगदान को पारदर्शी और नियमित करने के लिए लाया गया है.