सरकार की वैधता और कार्यक्षमता: नागरिकों का विश्वास कैसे लौटेगा?
सरकार की कार्यक्षमता बनाम वैधता
सरकार की कार्यक्षमता और उसके अधिकार की वैधता दो भिन्न अवधारणाएँ हैं। पहला प्रश्न यह है कि सरकार क्या कर सकती है? दूसरा यह कि उसे क्या करने का अधिकार है, किन प्रक्रियाओं के तहत और किसकी निगरानी में? चुनाव सरकार को शासन का जनादेश प्रदान करता है, लेकिन यह उन संस्थाओं पर स्वामित्व नहीं देता जो यह निर्धारित करती हैं कि सरकार का कार्य विधिक है या नहीं।
भारत में सरकार जितनी तेजी से सड़कें बना सकती है, उतनी ही तेजी से नागरिकों का विश्वास नहीं लौटा सकती कि उनकी शिकायतें सुनी जाएंगी और उन्हें न्याय मिलेगा। यही अंतर भारतीय गणतंत्र की एक बड़ी राजनीतिक समस्या बनता जा रहा है। सरकार की कार्यक्षमता में वृद्धि हुई है, जैसे कि एक्सप्रेसवे का निर्माण, डिजिटल भुगतान की सुविधा, और सरकारी सहायता का सीधा बैंक खातों में पहुंचना। लेकिन क्या नागरिकों का विश्वास उन संस्थाओं पर भी बढ़ा है जो सत्ता को अधिकार देती हैं और उसकी निगरानी करती हैं?
सड़कें मरीजों को अस्पताल जल्दी पहुंचा सकती हैं, और सरकारी सहायता परिवारों को भूख से बचा सकती है। ये उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन सरकार की कार्यक्षमता और उसके अधिकार की वैधता दो अलग बातें हैं। चुनाव सरकार को शासन का जनादेश देता है, लेकिन यह उन संस्थाओं पर स्वामित्व नहीं देता जो यह तय करती हैं कि सरकार का आचरण कानून के अनुसार है या नहीं।
इस भिन्नता को मतदाता सूची के संदर्भ में समझा जा सकता है। नागरिक को सरकार चुनने का अधिकार है, लेकिन प्रशासन को पहले यह स्वीकार करना होता है कि वह मतदान के लिए योग्य है। मतदाता सूची में नाम होना संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार का व्यावहारिक आधार है। इसमें हुई त्रुटियाँ नागरिक से उसका वोट छीन सकती हैं।
मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण आवश्यक है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाए जाने चाहिए, दोहरे पंजीकरण को ठीक किया जाना चाहिए, और निवास बदलने वालों के रिकॉर्ड को अद्यतन किया जाना चाहिए। लेकिन यह प्रक्रिया तभी वैध है जब नागरिक जान सके कि उनका नाम क्यों हटाया गया, त्रुटि को चुनौती दे सके, और मतदान से पहले इसे सुधार सके।
विशेष गहन पुनरीक्षण, जिसे एसआईआर कहा जाता है, के विवाद में विभिन्न श्रेणियों को एक ही आंकड़े में समाहित कर दिया गया है। मसौदा सूची से गायब नाम, हटाने के लिए प्रस्तावित नाम, वास्तव में अपात्र पाए गए मतदाता और गलती से बाहर हुए पात्र नागरिक एक समान नहीं हैं। न विपक्ष को इन्हें मिलाकर आरोप लगाने की अनुमति होनी चाहिए, न चुनाव अधिकारियों को प्रशासनिक आंकड़ों के पीछे नागरिक की वास्तविक स्थिति छिपाने की।
अगस्त 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार की मसौदा मतदाता सूची से बाहर हुए लगभग 65 लाख लोगों के नाम और प्रत्येक के हटाए जाने का कारण प्रकाशित करने का निर्देश दिया। अदालत ने न यह माना कि सारे नाम गलत हटाए गए, न यह कि सभी सही हटाए गए। उसने निर्णयों की जांच का रास्ता खोला। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या जांच से समय पर न्याय मिल सकता है?
किसी प्रवासी मजदूर को गाँव भेजे गए नोटिस का जवाब देने के लिए घर लौटना पड़े तो उसकी मजदूरी जाएगी। बुजुर्ग महिला को नोटिस पढ़वाने के लिए दूसरे का सहारा चाहिए। किरायेदार से ऐसे दस्तावेज मांगे जा सकते हैं जो स्थायी मकान मालिक के पास ही होते हैं। कागज पर अपील का अधिकार सबको है, लेकिन व्यवहार में उसका उपयोग सभी के लिए संभव नहीं।
इसलिए चुनाव आयोग केवल यह न बताए कि कितने नाम हटाए गए। यह भी बताए कि कितने नागरिकों को समझने योग्य नोटिस मिला, कितनों ने आपत्ति की और कितनों की गलती मतदान से पहले सुधरी। चुनाव के बाद जीती गई अपील उस वोट को वापस नहीं ला सकती जो डाला ही नहीं जा सका।
यहाँ एक बुनियादी सिद्धांत है। जिस संस्था के हाथ में समय और प्रक्रिया का नियंत्रण है, देरी की जिम्मेदारी भी उसी की होनी चाहिए।
केरल में 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले एक मतदाता का नाम सूची से हटा दिया गया। वह केवल मकान की मरम्मत के दौरान अस्थायी रूप से बाहर गया था। उसकी पत्नी और बेटी के नाम सूची में बने रहे। हाई कोर्ट ने माना कि नाम हटाने से पहले नागरिक को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन चुनाव समाप्त हो चुका था, इसलिए उसका मामला व्यावहारिक रूप से निष्फल हो गया। कानून उसके पक्ष में था, समय नहीं।
इससे चार वर्ष पहले केंद्रीय सूचना आयोग ने दिल्ली के मुख्य निर्वाचन अधिकारी को सुमित नामक मतदाता को दस हजार रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया था। उसका पता नहीं बदला था, फिर भी बिना नोटिस नाम हटने के कारण वह 2015 के विधानसभा चुनाव में वोट नहीं दे पाया। आयोग ने ऐसे प्रत्येक नागरिक के लिए मुआवजे और उचित समय में नाम बहाली का सिद्धांत रखा। लेकिन पैसा वोट का विकल्प नहीं है।
पश्चिम बंगाल के 2026 के विधानसभा चुनाव में समस्या कहीं बड़े पैमाने पर सामने आई। सेना के पूर्व तकनीशियन, 65 वर्षीय मुहम्मद दाऊद अली का नाम और उनके तीन बच्चों के नाम मतदाता सूची से हट गए। उनके पास पासपोर्ट और सैन्य सेवा के दस्तावेज थे। केवल पत्नी का नाम बचा रहा।
बंगाल में लगभग नब्बे लाख नाम हटाए गए। यानी करीब हर आठ में एक मतदाता। साठ लाख से अधिक लोगों को अनुपस्थित या मृत बताया गया। अन्य लगभग 27 लाख मामलों का फैसला न्यायाधिकरणों पर छोड़ा गया। अली का परिवार भी इन्हीं में था।
मतदाता सूची बंद हो चुकी थी। अली का सवाल था कि विवादों का फैसला हुए बिना चुनाव कैसे हो सकता है? लेकिन चुनाव हुआ और वे मतदान नहीं कर सके।
बाद में न्यायाधिकरणों के फैसले आने लगे। अगस्त तक सूचना के अधिकार से मिले रिकॉर्ड के अनुसार केवल लगभग दो प्रतिशत अपीलें निपटाई गई थीं। जिन 82,782 मामलों का फैसला हुआ, उनमें 75,443 मतदाताओं के नाम बहाल हुए। यानी दस में नौ से अधिक।
इसका अर्थ यह नहीं कि सभी हटाए गए नामों में नौ-दसवाँ हिस्सा गलत था। पहले निपटे मामलों की प्रकृति बाकी मामलों से अलग हो सकती है। लेकिन जिन मामलों की जांच हुई, उनके परिणाम बहुत कुछ बताते हैं।
सितंबर में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 37 लाख से अधिक अपीलें लंबित हैं। मौजूदा गति से इनके निपटारे में लगभग बारह वर्ष लग सकते हैं। आयोग ने न्यायाधिकरणों की संख्या दोगुनी से अधिक करने की मांग की। इससे पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने इक्कीस वर्ष का अनुमान दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह समयसीमा तय नहीं कर सकता।
सोचिए, जिस व्यवस्था को मतदाता का अधिकार बचाना है, उसी के हिसाब से अंतिम अपील निपटने तक दो और विधानसभा चुनाव निकल सकते हैं।
इसका उपाय क्या है? जिस नाम को हटाने का निर्णय मतदान से पहले न्यायिक समीक्षा से नहीं गुजर सकता, उसका हटना उस चुनाव के लिए प्रभावी नहीं होना चाहिए। इससे कुछ अपात्र नाम भी सूची में बने रहेंगे। यह वास्तविक जोखिम है। लेकिन एक अपात्र नाम मतों की गणना में मामूली विकृति पैदा करता है, जबकि पात्र नागरिक का नाम गलत हटना उसका पूरा मताधिकार समाप्त कर देता है। और इसकी सजा ऐसे व्यक्ति को मिलती है जिसने कोई गलती नहीं की।
यही पारदर्शिता राजनीतिक चंदे में भी जरूरी है। फरवरी 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक ठहराया क्योंकि राजनीतिक चंदे की जानकारी छिपाना नागरिकों के सूचना के अधिकार का उल्लंघन था। यह संस्थागत विफलता भी थी और संवैधानिक सुधार का उदाहरण भी।
हर चंदा रिश्वत नहीं होता। किसी बड़ी कंपनी को सरकारी ठेका मिलने से भ्रष्टाचार साबित नहीं हो जाता। लेकिन नागरिक को यह जांचने का अधिकार होना चाहिए कि राजनीतिक चंदे और सरकारी फैसलों में कोई संबंध है या नहीं।
जब जानकारी छिपी हो तो वैध सरकारी निर्णय और राजनीतिक कृपा में अंतर करना कठिन हो जाता है। कंपनियाँ समझने लगती हैं कि बेहतर उत्पाद या सेवा से अधिक जरूरी सत्ता में पहुँच है। बड़े उद्योग राजनीतिक जोखिम को व्यापार की लागत मानने लगते हैं। इससे प्रतिस्पर्धा और निवेश के नियम कमजोर होते हैं।
भारत को विश्वस्तरीय कंपनियाँ चाहिए। लेकिन राष्ट्रीय चैंपियन कहलाने के लिए स्वतंत्र जांच में खरा उतरना भी जरूरी है। जो कंपनी निष्पक्ष परीक्षण नहीं सह सकती, वह राष्ट्रीय चैंपियन नहीं, सत्ता की पसंदीदा कंपनी है।
जांच एजेंसियों पर भी यही कसौटी लागू होती है। विपक्ष में होना अभियोजन से छूट नहीं देता और सत्तारूढ़ दल में शामिल होना निर्दोष होने का प्रमाण नहीं है। सवाल है कि जांच किन आधारों पर शुरू होती है, गिरफ्तारी क्यों होती है और समान आरोपों पर समान कार्रवाई होती है या नहीं?
अगस्त 2024 में सरकार ने संसद को बताया कि 2014 से दर्ज धनशोधन के 5,297 मामलों में केवल चालीस में दोषसिद्धि और तीन में दोषमुक्ति हुई थी। ये आंकड़े अपराध साबित होने से अधिक न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि का सवाल उठाते हैं।
जिस कानून में जमानत मिलना असाधारण रूप से कठिन हो, वहाँ छापे और फैसले के बीच बीतते वर्ष किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता, आजीविका और प्रतिष्ठा छीन सकते हैं। अदालत में अपराध साबित होने से पहले ही आरोप सजा बन जाता है। तब कानूनी प्रक्रिया स्वयं राजनीतिक शक्ति हासिल कर लेती है।
एजेंसी तय करती है कि छापा कब पड़ेगा, आरोपपत्र कब दाखिल होगा और जांच कितने समय चलेगी। अभियुक्त के हाथ में इनमें से कुछ नहीं। इसलिए सरकार उचित समय में मुकदमा नहीं चला सकती तो उसकी दमनकारी कार्रवाई की अवधि सीमित होनी चाहिए, अभियुक्त के धैर्य की नहीं।
विपक्ष की भी जिम्मेदारी है। चुनाव में धांधली का आरोप लगाने के लिए पहचान योग्य रिकॉर्ड, दोबारा जांचे जा सकने वाले प्रमाण और उनके अनुरूप समाधान चाहिए। व्यापक आरोप समर्थकों को उत्तेजित कर सकते हैं, लेकिन दाऊद अली जैसे परिवारों के नाम मतदाता सूची में वापस नहीं जुड़ते।
विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र के लिए अनिवार्य हैं। नागरिक की राजनीतिक स्वतंत्रता पाँच वर्ष में एक बार वोट डालने तक सीमित नहीं। शांतिपूर्ण आंदोलन उन शिकायतों को सामने लाता है जिन्हें सामान्य व्यवस्था अनसुना करती है। लेकिन आंदोलन को ठोस काम में बदलना होगा। मतदाता पंजीकरण में सहायता, विधानमंडलों में निगरानी, अदालतों में प्रमाण और जनता के सामने विकल्प। संसद में व्यवधान का औचित्य उसकी पुनरावृत्ति नहीं, उससे सामने आई सच्चाई या हासिल परिणाम है।
सरकार की जिम्मेदारी अधिक है क्योंकि उसके पास दंड देने की शक्ति है। उसे आलोचना और खतरे में, शांतिपूर्ण सभा और हिंसा में फर्क करना होगा। असहमति को देशद्रोह मानने वाली सरकार स्वयं को उस जानकारी से वंचित करती है जो अपनी गलतियाँ सुधारने के लिए जरूरी है। अप्रिय चेतावनी दबाने वाला अधिकारी नियंत्रण का भ्रम बचाता है, समस्या को बढ़ने देता है।
यहाँ लोकतांत्रिक वैधता का असली प्रश्न है। बहुमतवादी सोच मानती है कि चुनाव जीतने से अगला चुनाव संचालित करने वाली संस्थाओं को भी अपने अनुसार बदलने का अधिकार मिल जाता है। संवैधानिक सोच कहती है कि विजेता उन नियमों के अधीन शासन करेगा जो उसके विरोधियों के अधिकार और भविष्य में सत्ता बदलने की संभावना सुरक्षित रखते हैं।
स्वतंत्र संस्थाएँ भी गलत हो सकती हैं। उनकी स्वतंत्रता का मतलब राजनीतिक आदेशों से सुरक्षा है, सार्वजनिक जांच से मुक्ति नहीं। असली परीक्षा है कि सरकार अपने विरुद्ध आए संस्थागत फैसले को स्वीकार करे और विपक्ष उसी संस्था की स्वतंत्रता का समर्थन तब भी करे जब फैसला उसके खिलाफ हो।
आपातकाल ने दिखाया था कि संवैधानिक अधिकार कितनी तेजी से खोखले किए जा सकते हैं। 1977 के जनादेश ने दिखाया कि शांतिपूर्ण सुधार संभव है। लेकिन संविधान में लिखी सुरक्षा तभी जीवित रहती है जब नागरिक उसका इस्तेमाल करने पर अड़े रहें।
इसलिए संस्थाओं से जवाबदेही की मांग ठोस होनी चाहिए। चुनाव आयोग नाम हटाने का कारण बताए और समय रहते अपील निपटाए। जांच एजेंसी गिरफ्तारी तथा कठोर कार्रवाई का औचित्य सिद्ध करे और मुकदमा अदालत तक पहुँचाए। नियामक संस्था अपने फैसलों के सार्वजनिक कारण बताए, चाहे सामने कितना ही प्रभावशाली उद्योगपति क्यों न हो। सरकार स्वीकार करे कि वैधानिक विरोध उसी लोकतंत्र का हिस्सा है जिस पर वह शासन करती है।
और इन सबके पीछे एक ही नियम हो। जिसके हाथ में प्रक्रिया और समय का नियंत्रण है, देरी का जवाब भी वही दे।
गणतंत्र की असली परीक्षा किसी शक्तिशाली व्यक्ति के सामने नहीं होती। वह उस मतदाता के सामने होती है जिसका नाम सूची से गायब है, उस कारोबारी के सामने जिसे बिना कारण बताए सरकारी फैसले का नुकसान उठाना पड़ता है, और उस अभियुक्त के सामने जो वर्षों से मुकदमा शुरू होने की प्रतीक्षा कर रहा है।
गणतंत्र नागरिकों का भरोसा तब अर्जित करता है जब उन्हें न्याय पाने के लिए पहले किसी ताकतवर आदमी की शरण में न जाना पड़े। यही वह भरोसा है जिसे कोई चुनावी जनादेश खरीद नहीं सकता।