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सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पैदल चलने का अधिकार मौलिक अधिकार

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ के उपयोग को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी है। आम आदमी पार्टी के सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर ने इस फैसले का स्वागत किया है, जो नागरिकों के सुरक्षित आवागमन के अधिकार को सुदृढ़ करता है। उन्होंने संसद में उठाए गए मुद्दों का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार ने इस गंभीर विषय पर संतोषजनक उत्तर नहीं दिया था। जानें इस महत्वपूर्ण निर्णय के पीछे की कहानी और इसके प्रभाव के बारे में।
 

पैदल चलने के अधिकार की मान्यता


पैदल चलने के अधिकार संबंधी का फैसला संसद में मीत हेयर द्वारा उठाए गए मुद्दों की पुष्टि का प्रमाण


चंडीगढ़ : आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता और संगरूर के सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर ने हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनाए गए एक महत्वपूर्ण फैसले का उल्लेख किया। इस निर्णय में पैदल चलने वालों के लिए फुटपाथ के उपयोग के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। उन्होंने कहा कि यह फैसला नागरिकों के सुरक्षित और सम्मानजनक आवागमन के संवैधानिक अधिकार को सुदृढ़ करता है। मीत हेयर ने बताया कि इस निर्णय ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर पैदल यात्रियों, साइकिल चालकों और अन्य गैर-मोटर चालित उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा को लेकर लोकसभा में उठाई गई चिंताओं को बल दिया है।


संसद में मुद्दा उठाने पर नहीं मिला था संतोषजनक जवाब

सांसद ने बताया कि उन्होंने 31 जुलाई 2025 को संसद में प्रश्नकाल के दौरान इस मुद्दे को उठाया था। उन्होंने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की थी कि क्या सरकार राष्ट्रीय राजमार्गों पर पैदल चलने वालों, साइकिल चालकों और अन्य गैर-मोटर चालित उपयोगकर्ताओं के सुरक्षित आवागमन के अधिकार को मान्यता देती है।


मीत हेयर ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने गंभीर मुद्दे के बावजूद केंद्र सरकार ने इसका अस्पष्ट और औपचारिक जवाब दिया। सरकार ने सुरक्षित आवागमन को अधिकार के रूप में स्वीकार करने या सभी राष्ट्रीय राजमार्गों पर पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचा सुनिश्चित करने की कोई ठोस योजना नहीं दी। इसके बजाय, केवल मौजूदा दिशा-निर्देशों और सड़क सुरक्षा ऑडिट का हवाला दिया गया, जो अपर्याप्त था।


उन्होंने आगे कहा कि अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि पैदल चलने का अधिकार संविधान के भाग-3 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है और सरकार को इसे पहले ही स्वीकार कर लेना चाहिए था।