सुप्रीम कोर्ट का महुआ मोइत्रा मामले में महत्वपूर्ण निर्णय
महुआ मोइत्रा से जुड़ा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा से संबंधित 'कैश-फॉर-क्वेरी' मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने शुक्रवार को दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी। इस आदेश में लोकपाल को महुआ मोइत्रा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति देने पर विचार करने के लिए कहा गया था।
सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही
लोकपाल ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। शीर्ष अदालत ने लोकपाल अधिनियम की धारा 20 से संबंधित प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए याचिका पर नोटिस जारी किया। अदालत ने महुआ मोइत्रा, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और शिकायतकर्ता बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे को भी नोटिस भेजा है।
हाई कोर्ट का निर्णय
हाई कोर्ट के फैसले के पैरा 89 पर रोक लगने से लोकपाल को महत्वपूर्ण राहत मिली है। अब यह मामला पूरी तरह से सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। दिल्ली हाई कोर्ट ने 19 दिसंबर 2025 को लोकपाल के 12 नवंबर 2025 के आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें सीबीआई को महुआ मोइत्रा के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने की अनुमति दी गई थी। हाई कोर्ट ने प्रक्रियागत खामियों का हवाला देते हुए लोकपाल से धारा 20 के तहत फिर से मंजूरी पर विचार करने को कहा था।
मामले का इतिहास
यह विवाद अक्टूबर 2023 में शुरू हुआ, जब वकील जय अनंत देहाद्राई ने सीबीआई और लोकसभा स्पीकर के खिलाफ शिकायत की। आरोप था कि महुआ मोइत्रा ने एक कारोबारी से पैसे और उपहारों के बदले लोकसभा में सवाल पूछे। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने भी मोइत्रा के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। 19 अक्टूबर 2023 को कारोबारी दर्शन हीरानंदानी ने हलफनामा दायर किया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि उन्होंने मोइत्रा के संसदीय लॉगिन का उपयोग कर सवाल पोस्ट किए।
लोकसभा की कार्रवाई
लोकसभा की एथिक्स कमेटी ने इस मामले की जांच की। मोइत्रा कमेटी के सामने पेश हुईं, लेकिन सवालों पर आपत्ति जताकर बाहर चली गईं। दिसंबर 2023 में उन्हें निष्कासित कर दिया गया। मार्च 2024 में सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज की। जून 2024 में महुआ मोइत्रा ने कृष्णानगर सीट से चुनाव जीतकर संसद में वापसी की। जुलाई 2025 में सीबीआई ने लोकपाल को जांच रिपोर्ट सौंपी, और नवंबर 2025 में लोकपाल ने चार्जशीट की मंजूरी दी, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया।