सुप्रीम कोर्ट ने CEC ज्ञानेश कुमार को निलंबित करने से किया इनकार, चुनाव आयोग को जारी किया नोटिस
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली: भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेदों और एकतरफा निर्णयों के आरोपों से संबंधित एक संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण जानकारी दी है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने CEC को निलंबित करने या उनकी शक्तियों को छीनने के लिए कोई अंतरिम आदेश देने से स्पष्ट इनकार कर दिया है। हालांकि, अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए चुनाव आयोग को औपचारिक नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट चेतावनी
एकतरफा फैसले रद्द होंगे:
सुनवाई के दौरान, CJI सूर्यकांत की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि निर्णय नियमों और संस्थागत सहमति को नजरअंदाज करके लिए गए थे, तो अदालत उन्हें तुरंत रद्द कर देगी। शीर्ष अदालत ने कहा, “पहले नोटिस का जवाब आने दीजिए। यदि चुनाव आयोग के रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि निर्णय एकतरफा तरीके से लिए गए थे, तो हम उन सभी फैसलों को रद्द कर देंगे।”
वरिष्ठ वकीलों की चिंताएं
सीईसी की प्रक्रियाओं पर सवाल:
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कहा कि जब तक मामले की अंतिम सुनवाई नहीं हो जाती, तब तक CEC की शक्तियों को निलंबित किया जाए। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने मतदाता पंजीकरण से जुड़े 'फॉर्म 6' में बदलावों और एसआईआर प्रक्रिया की खामियों को उजागर किया। उन्होंने कहा कि यह मामला चुनाव आयोग की निष्पक्षता और साख से जुड़ा है।
मीडिया रिपोर्ट का संदर्भ
10 महीनों में 14 बार आपत्तियां:
यह विवाद एक खोजी मीडिया रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, जिसमें कहा गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े फैसलों पर 14 बार आपत्ति जताई थी। दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि कई महत्वपूर्ण नीतिगत आदेश उनकी सहमति के बिना जारी किए गए।
अदालत की प्रक्रिया
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि चुनाव आयोग के तीनों सदस्यों से सर्वसम्मति से निर्णय लेने की अपेक्षा की जाती है। यदि सर्वसम्मति नहीं बनती है, तो निर्णय बहुमत के आधार पर होना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि केवल मीडिया रिपोर्ट के आधार पर तत्काल दंडात्मक आदेश नहीं दिया जा सकता; अदालत पहले चुनाव आयोग का आधिकारिक जवाब और आंतरिक रिकॉर्ड देखेगी, उसके बाद ही उचित न्यायिक आदेश जारी किया जाएगा।